September 18, 2026 3:27 pm

यशपाल शर्मा: गंभीर और जमीनी किरदारों का मजबूत चेहरा

यशपाल शर्मा के गंभीर और जमीनी किरदार

यशपाल शर्मा उन कलाकारों में हैं जिनकी पहचान गंभीरता, तीव्रता और यथार्थवाद से होती है। स्क्रीन पर वे चाहे पुलिस अधिकारी हों, राजनेता हों, गाँव के व्यक्ति हों या कोई नकारात्मक किरदार—उनकी मौजूदगी किरदार को अलग पहचान देती है। उनकी खासियत यह है कि वे सिर्फ संवाद बोलने या कैमरे के सामने मौजूद रहने तक सीमित नहीं रहते, बल्कि किरदार की सोच, व्यवहार और सामाजिक पृष्ठभूमि को समझकर उसे निभाने की कोशिश करते हैं।हरियाणा के हिसार के एक छोटे गाँव से शुरू हुआ उनका सफर रामलीला और स्थानीय थिएटर से होते हुए राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (NSD) तक पहुंचा। इसके बाद मुंबई का संघर्ष, फिल्मों में छोटे रोल, लगान में लाखा, गंगाजल में सुंदर यादव और कई दूसरे गंभीर किरदारों ने उनकी पहचान को मजबूत किया।

गरीबी के बीच रामलीला से मिली अभिनय की पहली सीख

यशपाल शर्मा का जन्म 9 अगस्त 1970 को हरियाणा के हिसार जिले के एक छोटे गाँव में हुआ। उनके पिता स्कूल में चपरासी थे और मां गृहिणी। परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद साधारण थी। आठवीं कक्षा से ही उन्हें परिवार की मदद के लिए काम करना पड़ा। उन्होंने रंग और पटाखे बेचने से लेकर मजदूरी तक कई छोटे-मोटे काम किए।लेकिन आर्थिक परेशानियां उनके भीतर के कलाकार को रोक नहीं सकीं। गाँव की रामलीला, रासलीला और स्थानीय कार्यक्रम उनके लिए सिर्फ मनोरंजन नहीं थे, बल्कि अभिनय सीखने की शुरुआती जगह भी थे। लोक प्रस्तुतियों में कलाकारों को दर्शकों के सामने सीधे अभिनय करते देखना उनके लिए एक तरह की अनौपचारिक ट्रेनिंग थी।यही जमीनी अनुभव आगे चलकर उनके अभिनय में दिखाई दिया। उनके कई किरदारों में गाँव, छोटे शहर और आम लोगों के व्यवहार की सहजता महसूस होती है।

नसीरुद्दीन शाह का नाटक देखने दिल्ली पहुंचे

1989 में उन्होंने नसीरुद्दीन शाह का नाटक देखने के लिए दिल्ली जाने का फैसला किया। दिल्ली में थिएटर करने के बाद उनका रुझान और मजबूत हुआ और उन्होंने NSD में प्रवेश लेने की कोशिश शुरू की। लेकिन NSD का रास्ता आसान नहीं था। उन्हें चार बार प्रयास करना पड़ा और आखिरकार 1994 में उनका चयन हुआ।NSD में उन्होंने सिर्फ अभिनय नहीं सीखा। स्टेजक्राफ्ट, लाइटिंग, स्केचिंग, कारपेंट्री, कॉस्ट्यूम डिजाइन और संगीत जैसे कई क्षेत्रों से उनका परिचय हुआ। वे NSD रेपर्टरी कंपनी से भी जुड़े और 70 से अधिक नाटकों में काम किया।इस प्रशिक्षण ने उनके अभिनय को एक मजबूत आधार दिया। वे किरदार को सिर्फ उसके संवादों से नहीं, बल्कि उसकी पूरी दुनिया के साथ देखने लगे।

मुंबई में संघर्ष, लेकिन हार नहीं मानी

1997 में यशपाल शर्मा मुंबई पहुंचे। फिल्म इंडस्ट्री में काम पाने के लिए उन्हें काफी संघर्ष करना पड़ा। निर्देशकों से मुलाकात के बावजूद आसानी से मौके नहीं मिलते थे। इस दौरान उन्होंने अपनी थिएटर ट्रेनिंग का इस्तेमाल अलग तरीके से किया।वे सिर्फ अपना परिचय देकर रोल मांगने के बजाय नाटकों के मोनोलॉग तैयार करके निर्देशकों के सामने प्रस्तुत करते थे। इससे उन्हें अपनी अभिनय क्षमता सीधे दिखाने का अवसर मिलता था।1998 में हज़ार चौरासी की माँ से उन्हें फिल्मों में शुरुआती मौका मिला। इसके बाद शूल, अर्जुन पंडित जैसी फिल्मों में भी काम किया, लेकिन अभी वह बड़ा ब्रेक आना बाकी था।

लगान’ के लाखा ने बदली पूरी पहचान

2001 में आशुतोष गोवारिकर की लगान आई और यशपाल शर्मा के करियर में एक बड़ा बदलाव आया। फिल्म में उन्होंने लाखा का किरदार निभाया। लाखा गाँव की क्रिकेट टीम का विरोध करता है और अंग्रेजों का समर्थन करता है।लेकिन लाखा सिर्फ एक विरोधी किरदार नहीं था। उसमें ईर्ष्या, असुरक्षा, अंग्रेजों के प्रति आकर्षण, अपनी सामाजिक स्थिति की समझ और परिस्थितियों के साथ बदलने की क्षमता जैसी कई परतें थीं। यशपाल शर्मा ने इन भावनाओं को एक साथ लेकर किरदार को अधिक मानवीय बनाया।उनकी प्रस्तुति में गाँव के व्यक्ति की सहजता और भीतर चल रहे संघर्ष दोनों दिखाई देते हैं। यही वजह रही कि लगान के बाद उनकी पहचान बदलने लगी और उन्हें ज्यादा काम मिलने लगा।

गंगाजल’ के सुंदर यादव में दिखा सत्ता का असर

2003 में प्रकाश झा की गंगाजल में उन्होंने सुंदर यादव की भूमिका निभाई। यह एक भ्रष्ट और प्रभावशाली राजनीतिक किरदार था, जिसके जरिए फिल्म में सत्ता और पुलिस व्यवस्था के बीच के संबंधों को दिखाया गया।इस भूमिका में उनकी आवाज़, आंखों का भाव और बॉडी लैंग्वेज किरदार की ताकत और आत्मविश्वास को सामने लाते हैं। किरदार में सत्ता का प्रभाव था, लेकिन उसके व्यवहार में केवल गुस्सा नहीं बल्कि अपने क्षेत्र पर नियंत्रण और व्यवस्था से समझौते की मानसिकता भी दिखाई देती है।यशपाल शर्मा ने इस भूमिका की तैयारी के लिए बिहार के राजनीतिक माहौल और स्थानीय नेताओं के व्यवहार को समझने की कोशिश की थी। भाषा और शारीरिक भाषा पर दिया गया ध्यान किरदार को अधिक वास्तविक बनाने में मददगार रहा।

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी’ में अलग तरह का किरदार

सुधीर मिश्रा की हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी में उन्होंने रणधीर सिंह की भूमिका निभाई। फिल्म का राजनीतिक और सामाजिक वातावरण उनके लिए एक अलग तरह की चुनौती लेकर आया। किरदार में आंदोलन, व्यक्तिगत संघर्ष, व्यवस्था के प्रति विद्रोह और आदर्शवाद-व्यावहारिकता का टकराव दिखाई देता है।इस भूमिका ने यह भी दिखाया कि यशपाल शर्मा किसी एक तरह के गंभीर किरदार तक सीमित नहीं हैं। वे अलग-अलग सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों में मौजूद लोगों के व्यवहार को अपनी अभिनय शैली में ढाल सकते हैं।

नकारात्मक किरदारों को सिर्फ ‘खलनायक’ नहीं बनाया

अब तक छप्पन और अपहरण जैसी फिल्मों में उन्होंने नकारात्मक भूमिकाएं निभाईं। इन किरदारों में अपराध, सत्ता, भ्रष्टाचार और हिंसा जैसी परिस्थितियां थीं।यशपाल शर्मा के लिए ऐसे किरदारों की चुनौती यह होती है कि वे उन्हें सिर्फ बुरा दिखाकर खत्म नहीं कर देते। वे उसकी मानसिकता, सामाजिक पृष्ठभूमि और व्यवहार को समझने की कोशिश करते हैं। इसी वजह से उनकी नकारात्मक भूमिकाओं में भी एक अलग तरह की मानवीय परत दिखाई देती है।उनकी आवाज़ में कभी अधिकार, कभी धमकी और कभी व्यंग्य का भाव दिखाई देता है। चाल, बैठने का तरीका और हाथों की गतिविधियां भी किरदार के अनुसार बदलती हैं।

व्यावसायिक फिल्मों में भी बनाए रखा अपना अंदाज़

यशपाल शर्मा ने गंभीर फिल्मों के साथ व्यावसायिक सिनेमा में भी काम किया। सिंह इज़ किंग में उन्होंने पिता की भूमिका निभाई, जबकि राउडी राठौर में पुलिस अधिकारी के किरदार में दिखाई दिए।इन भूमिकाओं में उन्होंने यह साबित किया कि उनका अभिनय केवल गंभीर या नकारात्मक किरदारों तक सीमित नहीं है। पिता के किरदार में भावनात्मकता और पुलिस अधिकारी में जिम्मेदारी जैसे अलग-अलग भावों को भी उन्होंने सहजता से निभाया।उनकी सोच के अनुसार फिल्म छोटी हो या बड़ी, व्यावसायिक हो या समानांतर सिनेमा—अच्छी कहानी और अच्छा किरदार सबसे महत्वपूर्ण है।

टेलीविजन से ‘दादा लखमी’ तक

टेलीविजन पर मेरा नाम करेगी रोशन में उन्होंने कुँवर कुलदीप का नकारात्मक किरदार निभाया। टीवी के लगातार शूटिंग शेड्यूल और समय की पाबंदियों के बावजूद उन्होंने अपनी अभिनय शैली को बनाए रखा।इसके बाद 2024 में दादा लखमी के निर्देशन के साथ उनके रचनात्मक सफर का एक नया पक्ष सामने आया। फिल्म हरियाणा के प्रसिद्ध लोक कवि और नाटककार पंडित लखमी चंद पर आधारित थी। इसमें हरियाणा की संस्कृति, भाषा और लोक कला को सिनेमा से जोड़ने की कोशिश दिखाई गई।यह उनके लिए सिर्फ अभिनय से आगे बढ़कर अपनी जड़ों और लोक संस्कृति से जुड़े विषय को सिनेमा में लाने का अवसर भी था।

थिएटर मेरा असली घर है’

फिल्मों और टेलीविजन में लंबे समय तक काम करने के बावजूद थिएटर से उनका रिश्ता आज भी मजबूत है। यशपाल शर्मा ने एक इंटरव्यू में कहा था कि थिएटर मेरा असली घर है।”उनके लिए थिएटर इसलिए खास है क्योंकि यहां कलाकार और दर्शक के बीच सीधा संवाद होता है। हर प्रदर्शन के बाद दर्शकों की प्रतिक्रिया से अभिनेता अपने काम में सुधार कर सकता है। सिनेमा में एक बार दृश्य शूट हो जाने के बाद उसे उसी तरीके से बदलना संभव नहीं होता।यही वजह है कि थिएटर उनके अभिनय की लगातार चलने वाली प्रयोगशाला जैसा रहा है।

गंभीर और जमीनी किरदारों की असली ताकत

यशपाल शर्मा के अभिनय की सबसे खास बात उनकी जमीनी वास्तविकता है। उनके भीतर गाँव का अनुभव, आर्थिक संघर्ष, थिएटर की तैयारी और लंबे समय तक अलग-अलग तरह के किरदारों को देखने-समझने की प्रक्रिया दिखाई देती है।वे किरदार को सिर्फ उसके बाहरी रूप से नहीं देखते। उसकी सामाजिक स्थिति, भाषा, व्यवहार, मानसिकता और कमजोरियों को भी समझने की कोशिश करते हैं। इसी वजह से उनकी आवाज़ और बॉडी लैंग्वेज हर किरदार के साथ बदलती दिखाई देती है।उनके अभिनय में एक और महत्वपूर्ण बात है—किरदार को अभिनेता से बड़ा बनाना। वे इस बात पर ज्यादा ध्यान देते हैं कि दर्शक को किरदार वास्तविक लगे, न कि सिर्फ यह दिखाई दे कि कोई अभिनेता अभिनय कर रहा है।

पर्दे पर यशपाल शर्मा कम, किरदार ज्यादा दिखाई देता है

यशपाल शर्मा की यात्रा को देखें तो उनके अभिनय की एक निरंतरता दिखाई देती है। गाँव की रामलीला से शुरू हुई रुचि थिएटर तक पहुंची, NSD ने उसे प्रशिक्षण दिया और मुंबई के संघर्ष ने उसे व्यावहारिक अनुभव दिया। इसके बाद लगान, गंगाजल, हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी जैसी फिल्मों ने उनके अलग-अलग अभिनय रंगों को सामने रखा।उनकी सबसे बड़ी खासियत यही है कि वे किरदार को अपनी पहचान दिखाने का माध्यम नहीं बनाते, बल्कि खुद को किरदार के अनुसार ढालने की कोशिश करते हैं। गंभीरता, जमीनीपन, आवाज़ का प्रभाव, बॉडी लैंग्वेज और थिएटर से मिली तैयारी—ये सभी चीजें मिलकर उनकी अभिनय शैली बनाती हैं।इसी वजह से यशपाल शर्मा के कई किरदार स्क्रीन पर सीमित समय में भी अपनी अलग छाप छोड़ते हैं। उनका सफर दिखाता है कि एक अभिनेता की पहचान केवल मुख्य भूमिका से नहीं, बल्कि हर किरदार को कितनी सच्चाई और तैयारी के साथ जिया गया है, इससे भी बनती है।

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