October 20, 2026 9:32 am

भारत में दशहरा अलग-अलग तरीके से क्यों मनाया जाता है? जानिए देश की अनोखी परंपराएँ

भारत में दशहरे की अलग-अलग परंपराएँ—रावण दहन, दुर्गा पूजा, मैसूर, कुल्लू और बस्तर दशहरा

भारत त्योहारों और विविध संस्कृतियों का देश है। यहाँ एक ही त्योहार अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग परंपराओं, मान्यताओं और रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाता है। ऐसा ही एक प्रमुख त्योहार है दशहरा, जिसे विजयादशमी भी कहा जाता है। यह पर्व बुराई पर अच्छाई और अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक माना जाता है।
उत्तर भारत में जहाँ दशहरे पर भगवान श्रीराम की रावण पर विजय का उत्सव मनाया जाता है, वहीं पश्चिम बंगाल में यह पर्व माँ दुर्गा की महिषासुर पर विजय और उनकी विदाई से जुड़ा है। मैसूर में दशहरे की शाही परंपरा देखने को मिलती है, जबकि छत्तीसगढ़ के बस्तर में दशहरा अपनी अनूठी आदिवासी संस्कृति और लगभग 75 दिनों तक चलने वाले उत्सव के लिए प्रसिद्ध है।

आइए जानते हैं कि भारत के अलग-अलग हिस्सों में दशहरा किस तरह मनाया जाता है और इन परंपराओं के पीछे क्या खास बात है।

 उत्तर भारत: रावण दहन और रामलीला की परंपरा

उत्तर भारत के कई राज्यों में दशहरा भगवान श्रीराम की रावण पर विजय के रूप में मनाया जाता है। इस अवसर पर रामलीला का आयोजन किया जाता है, जिसमें भगवान श्रीराम के जीवन और रामायण की प्रमुख घटनाओं का मंचन होता है। दशहरे के दिन रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के बड़े-बड़े पुतले बनाए जाते हैं और उनका दहन किया जाता है। यह बुराई, अहंकार और अन्याय के अंत का प्रतीक माना जाता है। दिल्ली, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और अन्य राज्यों के अनेक शहरों में दशहरा मेले आयोजित होते हैं। इन मेलों में लोग परिवार के साथ शामिल होते हैं और धार्मिक कार्यक्रमों के साथ सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का आनंद लेते हैं।

खास बात: उत्तर भारत में दशहरा मुख्य रूप से भगवान श्रीराम की विजय और सत्य की शक्ति का संदेश देता है।

 पश्चिम बंगाल: दुर्गा पूजा और विजयादशमी

पश्चिम बंगाल में दशहरा, दुर्गा पूजा के भव्य उत्सव का हिस्सा है। यहाँ नवरात्रि के दौरान माँ दुर्गा की सुंदर प्रतिमाएँ स्थापित की जाती हैं और कई दिनों तक पूजा-अर्चना, सांस्कृतिक कार्यक्रम तथा पंडाल दर्शन होते हैं। मान्यता के अनुसार, माँ दुर्गा ने महिषासुर का वध करके बुराई पर विजय प्राप्त की थी। विजयादशमी के दिन माँ दुर्गा को विदाई दी जाती है। कई स्थानों पर महिलाएँ सिंदूर खेला की परंपरा निभाती हैं और इसके बाद प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाता है। कोलकाता सहित पश्चिम बंगाल के अनेक क्षेत्रों में दुर्गा पूजा सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस दौरान सजाए गए पंडाल, कलात्मक प्रतिमाएँ और पारंपरिक आयोजन विशेष आकर्षण होते हैं।

खास बात: पश्चिम बंगाल में विजयादशमी माँ दुर्गा की विजय, शक्ति और उनके मायके से विदा होने की भावनात्मक परंपरा से जुड़ी है।

 मैसूर: शाही अंदाज में दशहरा

कर्नाटक के मैसूर का दशहरा अपनी भव्यता और ऐतिहासिक परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है। इसे मैसूर दशहरा भी कहा जाता है। इसकी पहचान मैसूर राजपरिवार से जुड़ी शाही परंपराओं, रोशनी से जगमगाते मैसूर महल और विजयादशमी के दिन निकलने वाले भव्य जुलूस से होती है। इस अवसर पर मैसूर महल को आकर्षक रोशनी से सजाया जाता है। सांस्कृतिक कार्यक्रम, संगीत, नृत्य और विभिन्न पारंपरिक आयोजन उत्सव की शोभा बढ़ाते हैं। विजयादशमी पर निकलने वाली जम्बू सवारी इस उत्सव का प्रमुख आकर्षण है। इसमें सजे हुए हाथियों के साथ पारंपरिक जुलूस निकाला जाता है। यह आयोजन मैसूर की सांस्कृतिक विरासत और ऐतिहासिक पहचान को दर्शाता है।

खास बात: मैसूर का दशहरा धार्मिक आस्था के साथ-साथ कर्नाटक की शाही विरासत और सांस्कृतिक गौरव का भी प्रतीक है।

हिमाचल प्रदेश: कुल्लू का अनोखा दशहरा

हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में मनाया जाने वाला दशहरा देश के अन्य हिस्सों से कुछ अलग है। यहाँ उत्सव की शुरुआत विजयादशमी के दिन होती है, जबकि कई अन्य स्थानों पर इसी दिन दशहरा उत्सव का समापन होता है। कुल्लू दशहरे में भगवान रघुनाथ की विशेष पूजा की जाती है। विभिन्न क्षेत्रों के देवी-देवताओं की पालकियाँ पारंपरिक वाद्ययंत्रों और धार्मिक उत्साह के साथ उत्सव में शामिल होती हैं। इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक कुल्लू पहुँचते हैं। देव परंपराएँ, स्थानीय लोक संस्कृति और सामूहिक आयोजन इस उत्सव को विशेष पहचान देते हैं।

खास बात: कुल्लू में विजयादशमी दशहरे का अंत नहीं, बल्कि एक बड़े धार्मिक उत्सव की शुरुआत है।

 छत्तीसगढ़ का बस्तर: जहाँ लगभग 75 दिनों तक मनाया जाता है दशहरा

छत्तीसगढ़ के बस्तर का दशहरा भारत के सबसे अनूठे दशहरा आयोजनों में गिना जाता है। इसकी सबसे खास बात यह है कि यहाँ दशहरा उत्सव लगभग 75 दिनों तक चलने वाली परंपरा के रूप में प्रसिद्ध है। इसकी धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान इसे देश के अन्य दशहरा आयोजनों से अलग बनाती है। बस्तर दशहरे का प्रमुख संबंध माँ दंतेश्वरी की आराधना से है। यहाँ उत्तर भारत की तरह रावण दहन इस उत्सव का मुख्य केंद्र नहीं होता। इसके बजाय स्थानीय देवी-देवताओं की पूजा, पारंपरिक अनुष्ठान, सामुदायिक सहभागिता और विशाल लकड़ी के रथ से जुड़ी परंपराएँ विशेष महत्व रखती हैं। इस उत्सव में बस्तर के विभिन्न क्षेत्रों के स्थानीय समुदाय भाग लेते हैं। कई अनुष्ठानों में आदिवासी समाज की परंपराएँ, लोक मान्यताएँ और पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक विरासत दिखाई देती है। बस्तर दशहरा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि स्थानीय समाज की सामूहिक पहचान और सांस्कृतिक एकता का भी प्रतीक है। इसकी अलग-अलग रस्में और आयोजन इसे विशिष्ट बनाते हैं।

खास बात: बस्तर में दशहरा लगभग 75 दिनों तक चलने वाले उत्सव, माँ दंतेश्वरी की आराधना और समृद्ध आदिवासी परंपराओं के लिए जाना जाता है।

 कुछ स्थानों पर रावण से जुड़ी अलग मान्यताएँ

भारत में दशहरे की परंपराएँ केवल एक जैसी नहीं हैं। कुछ स्थानों पर रावण से जुड़ी स्थानीय मान्यताएँ भी प्रचलित हैं। उदाहरण के तौर पर, उत्तर प्रदेश के बिसरख गाँव को स्थानीय परंपरा में रावण की जन्मस्थली माना जाता है। यहाँ कुछ लोग रावण को सम्मान की दृष्टि से देखते हैं और उससे जुड़ी धार्मिक मान्यताओं का पालन करते हैं। यह ध्यान रखना जरूरी है कि ऐसी मान्यताएँ स्थानीय परंपराओं और लोककथाओं से जुड़ी हैं; इनके बारे में अलग-अलग ऐतिहासिक और धार्मिक व्याख्याएँ मिल सकती हैं।

खास बात: भारत की सांस्कृतिक विविधता के कारण एक ही पौराणिक पात्र को लेकर अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न मान्यताएँ देखने को मिलती हैं।

आखिर भारत में दशहरा अलग-अलग तरीके से क्यों मनाया जाता है?

भारत में दशहरा मनाने के तरीकों में अंतर के पीछे कई कारण हैं। हर क्षेत्र का अपना इतिहास, धार्मिक विश्वास, स्थानीय देवी-देवताओं से जुड़ाव और सांस्कृतिक विकास रहा है। समय के साथ इन परंपराओं ने अलग-अलग रूप ले लिए। कहीं भगवान श्रीराम की विजय का उत्सव प्रमुख है, तो कहीं माँ दुर्गा की आराधना। कहीं शाही जुलूस निकलते हैं, तो कहीं स्थानीय देवी-देवताओं की पालकियाँ और पारंपरिक रथ यात्रा उत्सव का केंद्र बनती हैं। इन सभी परंपराओं का मूल संदेश एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है—अच्छाई की विजय, बुराई का अंत, धर्म के प्रति आस्था और समाज में सकारात्मक मूल्यों की स्थापना।

दशहरा भारत की सांस्कृतिक विविधता और धार्मिक परंपराओं का सुंदर उदाहरण है। उत्तर भारत का रावण दहन, पश्चिम बंगाल की दुर्गा पूजा, मैसूर की शाही जम्बू सवारी, कुल्लू का विजयादशमी से शुरू होने वाला उत्सव और बस्तर का लगभग 75 दिनों तक चलने वाला दशहरा—ये सभी इस त्योहार को अलग-अलग पहचान देते हैं। यही भारत की खूबसूरती है कि त्योहार का मूल संदेश एक होने के बावजूद उसे मनाने के तरीके अलग-अलग हैं। ये परंपराएँ हमें अपनी सांस्कृतिक विरासत को समझने, उसका सम्मान करने और देश की विविधता पर गर्व करने का अवसर देती हैं।

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