October 17, 2026 4:32 am

भारतीय पासपोर्ट की कहानी: कागजी दस्तावेज से बायोमेट्रिक पासपोर्ट तक का सफर

भारतीय पासपोर्ट का इतिहास दर्शाती तस्वीर, जिसमें भारतीय पासपोर्ट और तिरंगे की पृष्ठभूमि दिखाई गई है

आज पासपोर्ट अंतरराष्ट्रीय यात्रा के लिए सबसे जरूरी दस्तावेजों में से एक है। विदेश जाने वाले भारतीय नागरिकों के लिए पासपोर्ट उनकी पहचान और यात्रा से जुड़ा महत्वपूर्ण दस्तावेज है। लेकिन भारतीय पासपोर्ट का इतिहास सिर्फ आधुनिक यात्रा व्यवस्था तक सीमित नहीं है। इसकी कहानी औपनिवेशिक दौर से शुरू होकर स्वतंत्र भारत के नागरिक अधिकारों और आज की बायोमेट्रिक तकनीक तक पहुंचती है।भारतीय पासपोर्ट की यात्रा 1847 में ईस्ट इंडिया कंपनी के दौर से शुरू हुई, जब ब्रिटिश विषयों के लिए यात्रा से जुड़ा दस्तावेज उपलब्ध कराने की व्यवस्था को नियमित किया गया। इसके बाद अगले कई दशकों में पासपोर्ट व्यवस्था में बड़े बदलाव हुए।

1847 में शुरू हुई पासपोर्ट व्यवस्था

1847 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपने भारतीय क्षेत्रों से बाहर जाने वाले ब्रिटिश विषयों के लिए एक दस्तावेज उपलब्ध कराने की व्यवस्था को नियमित किया। इसका उद्देश्य ब्रिटिश क्राउन के संरक्षण से जुड़े अधिकार को प्रमाणित करना था।उस समय पासपोर्ट आज की तरह भारतीय नागरिकता और व्यक्तिगत यात्रा अधिकार का प्रतीक नहीं था। यह औपनिवेशिक शासन की प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा था।बाद में 1884 में मक्का और मदीना जाने वाले मुस्लिम तीर्थयात्रियों के लिए मुफ्त तीर्थयात्री पासपोर्ट की व्यवस्था भी शुरू की गई।

1920 में आया भारतीय पासपोर्ट अधिनियम

प्रथम विश्व युद्ध के बाद भारत में विदेशी यात्रा पर नियंत्रण और मजबूत हुआ। 1920 में Indian Passport Act पारित किया गया, जिसे बाद में Passport (Entry into India) Act, 1920 के रूप में जाना गया।इस कानून ने भारत से बाहर यात्रा करने और भारत में प्रवेश करने से जुड़े पासपोर्ट नियमों को औपचारिक रूप दिया।ब्रिटिश भारतीय पासपोर्ट मुख्य रूप से ब्रिटिश साम्राज्य के संदर्भ में इस्तेमाल होता था। इसका उपयोग ब्रिटिश साम्राज्य के साथ-साथ कुछ यूरोपीय देशों में यात्रा के लिए भी मान्य था।उस समय के पासपोर्ट का रंग गहरा नीला था। उस पर “BRITISH INDIAN PASSPORT” और “INDIAN EMPIRE” जैसे शब्द लिखे होते थे तथा ब्रिटिश कोट ऑफ आर्म्स का इस्तेमाल किया जाता था।

स्वतंत्रता के बाद बदली पासपोर्ट की पहचान

1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद पासपोर्ट व्यवस्था में बड़ा बदलाव आया। स्वतंत्रता के बाद कुछ समय के लिए पासपोर्ट सेवाएं बंद रहीं और 1952 में दोबारा शुरू हुईं।अब पासपोर्ट ब्रिटिश शासन की व्यवस्था का हिस्सा नहीं था, बल्कि स्वतंत्र भारत के नागरिकों के लिए राष्ट्रीय यात्रा दस्तावेज बनने लगा।1950 के दशक के शुरुआती भारतीय पासपोर्ट काफी साधारण होते थे। वे कागज की पुस्तिका के रूप में होते थे और कई बार उनमें जानकारी हाथ से या टाइपराइटर से लिखी जाती थी। उन पर भारत का राज्य प्रतीक और हिंदी तथा अंग्रेजी में विवरण होता था।

1967: पासपोर्ट व्यवस्था का सबसे बड़ा कानूनी बदलाव

भारतीय पासपोर्ट के इतिहास में 24 जून 1967 बेहद महत्वपूर्ण तारीख है। इसी दिन Passports Act, 1967 लागू हुआ। इस कानून ने भारत में पासपोर्ट जारी करने की व्यवस्था के लिए एक वैधानिक ढांचा तैयार किया।इस कानून के तहत केंद्र सरकार को पासपोर्ट जारी करने, अस्वीकार करने, जब्त करने और रद्द करने से जुड़े अधिकार मिले।1967 के सुप्रीम कोर्ट के एक ऐतिहासिक फैसले का भी उल्लेख मिलता है, जिसमें पासपोर्ट रखने और विदेश यात्रा के अधिकार को प्रत्येक भारतीय का मौलिक अधिकार माना गया।यही वह दौर था जब भारतीय पासपोर्ट औपनिवेशिक नियंत्रण के दस्तावेज से आगे बढ़कर नागरिक अधिकारों और स्वतंत्र यात्रा से जुड़े दस्तावेज के रूप में स्थापित हुआ।

भारतीय पासपोर्ट कितने प्रकार के होते हैं?

पासपोर्ट अधिनियम के बाद तीन प्रमुख प्रकार के पासपोर्ट का उल्लेख मिलता है:

  • गहरा नीला: आम नागरिकों के लिए Ordinary Passport
  • सफेद: सरकारी अधिकारियों के लिए Official Passport
  • मरून: राजनयिकों के लिए Diplomatic Passport

स्वतंत्रता के बाद पासपोर्ट जारी करने की जिम्मेदारी विदेश मंत्रालय ने संभाली। शुरुआती पांच पासपोर्ट कार्यालय मुंबई, कोलकाता, दिल्ली, चेन्नई और नागपुर में थे।

1970 और 1980 के दशक में हुआ मानकीकरण

1970 और 1980 के दशक में भारतीय पासपोर्ट के प्रारूप और प्रिंटिंग को धीरे-धीरे मानकीकृत किया गया। 1980 में Passport Rules लागू हुए, जबकि 1983 में Passport Manual को फिर से एकीकृत किया गया।इससे पासपोर्ट जारी करने की प्रशासनिक प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित बनाने में मदद मिली।

1990 के दशक में आया Machine Readable Passport

तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल के साथ भारतीय पासपोर्ट भी आधुनिक होने लगा। 1990 के दशक में भारत ने Machine Readable Passport यानी MRP अपनाया।इन पासपोर्ट में पहचान वाले पेज पर Machine Readable Zone (MRZ) होती थी, जिसे इमिग्रेशन चेकपॉइंट पर मशीनों के जरिए स्कैन किया जा सकता था। इससे सीमा नियंत्रण और पहचान सत्यापन की प्रक्रिया पहले की तुलना में ज्यादा तेज और व्यवस्थित हुई।यह भारतीय पासपोर्ट को कागजी दस्तावेज से तकनीक आधारित यात्रा दस्तावेज की दिशा में ले जाने वाला महत्वपूर्ण कदम था।

2010 के दशक में बढ़ी सुरक्षा

पासपोर्ट में सिर्फ जानकारी दर्ज करना ही पर्याप्त नहीं था। फर्जी पासपोर्ट और दस्तावेजों की जालसाजी को रोकने के लिए सुरक्षा तकनीकों को भी मजबूत किया गया।2010 और 2020 के दशक में भारतीय पासपोर्ट में होलोग्राफिक इमेज, UV-visible elements, microprinting और बेहतर security paper जैसी सुविधाएं शामिल की गईं।इसके बाद 2019 Series Machine Readable Passport जारी किया गया, जिसमें सुरक्षा को और मजबूत किया गया।

2025 में बायोमेट्रिक पासपोर्ट का दौर

भारतीय पासपोर्ट के तकनीकी विकास में अगला बड़ा कदम 2025 में बायोमेट्रिक पासपोर्ट के रूप में आया। इसमें बायोमेट्रिक डेटा, इलेक्ट्रॉनिक चिप और बेहतर सुरक्षा सुविधाओं का इस्तेमाल किया गया।बायोमेट्रिक पासपोर्ट का उद्देश्य यात्री की पहचान को ज्यादा सुरक्षित तरीके से सत्यापित करना और पासपोर्ट की जालसाजी को मुश्किल बनाना है।2035 तक सभी मौजूदा वैध गैर-बायोमेट्रिक पासपोर्टों को बायोमेट्रिक पासपोर्ट से बदलने की योजना का भी उल्लेख है।

पासपोर्ट बनवाने की प्रक्रिया भी हुई आसान

तकनीकी बदलाव सिर्फ पासपोर्ट की सुरक्षा तक सीमित नहीं रहे। पासपोर्ट के लिए आवेदन करने की प्रक्रिया में भी बदलाव आया।2000 के दशक में Passport Seva Kendra (PSK) और Post Office Passport Seva Kendra (POPSK) की शुरुआत हुई। इसके बाद 2010 के दशक में ऑनलाइन आवेदन व्यवस्था शुरू हुई, जिससे लोगों के लिए घर से पासपोर्ट आवेदन करना आसान हुआ।इसी दौर में Tatkal Service जैसी सुविधा भी शुरू हुई, जिसके जरिए जरूरतमंद आवेदक तेजी से पासपोर्ट प्राप्त कर सकते हैं।

2026 में भारतीय पासपोर्ट की स्थिति

2026 में भारत में 2 करोड़ से अधिक पासपोर्ट धारक हैं और भारत दुनिया के दूसरे सबसे बड़े पासपोर्ट जारी करने वाले देशों में शामिल है। पासपोर्ट जारी करने की जिम्मेदारी विदेश मंत्रालय (MEA) के पास है।आज भारतीय पासपोर्ट में Machine Readable Zone, सुरक्षा प्रिंटिंग, होलोग्राफिक फीचर्स और बायोमेट्रिक तकनीक जैसी कई आधुनिक सुविधाएं शामिल हो चुकी हैं।

1847 से 2025 तक भारतीय पासपोर्ट का सफर

भारतीय पासपोर्ट की यात्रा को कुछ महत्वपूर्ण पड़ावों में समझा जा सकता है:

  • 1847: ईस्ट इंडिया कंपनी के दौर में पासपोर्ट व्यवस्था
  • 1884: मुस्लिम तीर्थयात्रियों के लिए मुफ्त तीर्थयात्री पासपोर्ट
  • 1920: Indian Passport Act
  • 1947: स्वतंत्रता के बाद पासपोर्ट व्यवस्था में बदलाव
  • 1952: पासपोर्ट सेवाएं दोबारा शुरू
  • 1967: Passports Act लागू
  • 1970-80: पासपोर्ट का मानकीकरण
  • 1990 का दशक: Machine Readable Passport
  • 2010-20: सुरक्षा तकनीकों में विस्तार
  • 2019: Series 2019 MRP
  • 2025: बायोमेट्रिक पासपोर्ट
  • 2035: सभी वैध गैर-बायोमेट्रिक पासपोर्ट को बायोमेट्रिक बनाने की योजना

1847 में औपनिवेशिक प्रशासन की जरूरतों से जुड़ी पासपोर्ट व्यवस्था आज नागरिकों की अंतरराष्ट्रीय यात्रा और पहचान का महत्वपूर्ण दस्तावेज बन चुकी है। भारतीय पासपोर्ट का यह सफर कागजी पुस्तिका से Machine Readable Passport और फिर बायोमेट्रिक तकनीक तक पहुंचा है। आने वाले वर्षों में पासपोर्ट व्यवस्था और अधिक डिजिटल होने की दिशा में बढ़ सकती है, जबकि 2035 तक सभी वैध गैर-बायोमेट्रिक पासपोर्टों को बदलने की योजना इस बदलाव को और आगे ले जाने वाली है।

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