नई दिल्ली: कई विश्वविद्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों ने केंद्र सरकार से VBSA (वित्तीय और बजट समर्थन अनुबंध) संरचना के तहत एक अलग अनुदान वितरण प्राधिकरण स्थापित करने का आग्रह किया है। उनका मानना है कि वर्तमान में अनुदान देने की शक्तियां एक नियामक के पास केंद्रित हैं, जिससे सार्वजनिक विश्वविद्यालयों, विशेष रूप से राज्य स्तर के संस्थान जो केंद्रीय सहायता पर निर्भर हैं, के लिए अस्थिरता उत्पन्न हो सकती है।
शैक्षणिक जगत के प्रमुख अधिकारियों और विशेषज्ञों ने बताया कि यदि अनुदान देने की शक्तियां नियामक के हाथों से छीन ली गईं, तो इसका सीधा असर सरकारी विश्वविद्यालयों की वित्तीय योजना और परिनियोजन पर पड़ेगा। इससे योजनाओं की स्थिरता खतरे में पड़ सकती है और छात्रों के हितों पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है।
कई राज्यों के उच्च शिक्षा विभागों ने भी यह चिंता व्यक्त की है कि केंद्रीय सहायता पर आधारित राज्य विश्वविद्यालयों के लिए अनुदान वितरण में देरी या अनिश्चितता उत्पन्न होने से शैक्षणिक गतिविधियों में व्यवधान आ सकता है। उनकी राय में, यदि एक अलग और स्वतंत्र प्राधिकरण स्थापित किया जाए जो वीबीएसए के तहत सीधे अनुदानों का प्रबंधन करे, तो इससे वित्तीय प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और दक्षता आएगी।
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि वर्तमान नियामक संस्थान के पास नीति निर्माण एवं अनुपालन का कार्यभार अधिक है, जिससे अनुदानों का त्वरित और प्रभावी वितरण प्रभावित हो सकता है। इसलिए, एक समर्पित संस्था की स्थापना अनुदान वितरण के कार्य में तेजी लाने और विश्वविद्यालयों की वित्तीय स्थिति को बेहतर बनाने में मदद कर सकती है।
यह मुद्दा तब अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है जब देश भर के कई राज्यात्मक विश्वविद्यालय कोविड-19 महामारी के बाद वित्तीय चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। सरकारी अनुदानों में देरी के कारण शोध, अध्यापन और छात्र कल्याण जैसी महत्वपूर्ण गतिविधियों में बाधा आ सकती है।
सरकारी सूत्रों के अनुसार, इस मामले पर जल्द ही उच्च स्तरीय बैठकें आयोजित कर उचित व्यवस्था पर विचार किया जाएगा। दूसरी ओर, शैक्षणिक संस्थान और विश्वविद्यालय संगठनों ने इस प्रस्ताव का स्वागत करते हुए कहा है कि इससे शिक्षा क्षेत्र में वित्तीय स्थिरता बनी रहेगी और व्यापक सुधार संभव होगा।
संक्षेप में, वीबीएसए संरचना के तहत अलग अनुदान वितरण प्राधिकरण की मांग सार्वजनिक विश्वविद्यालयों की वित्तीय स्थिति को मजबूत करने तथा उन्हें केंद्रीकृत अनुदान वितरण के जोखिमों से बचाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। यह पहल शिक्षा के विस्तार और गुणवत्ता सुधार के लिए भी सहायक साबित हो सकती है।













