भारतीय सिनेमा की पहचान केवल उसकी कहानियों और कलाकारों से नहीं, बल्कि उसके संगीत से भी जुड़ी है। फिल्मों के गीत और संगीत दशकों से भारतीय संस्कृति का अहम हिस्सा रहे हैं। मूक फिल्मों में लाइव वादन से शुरू हुआ यह सफर आज डिजिटल तकनीक और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों तक पहुंच चुका है। आइए जानते हैं भारतीय फिल्म संगीत के विकास की पूरी कहानी।
मूक फिल्मों के दौर में लाइव संगीत की परंपरा (1913–1931)
भारतीय सिनेमा की शुरुआत वर्ष 1913 में दादा साहब फाल्के की पहली फीचर फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ से हुई। उस समय फिल्में मूक (साइलेंट) होती थीं और उनमें संवाद या रिकॉर्ड किया गया संगीत नहीं होता था।दर्शकों को कहानी से जोड़ने के लिए सिनेमाघरों में पर्दे के ठीक नीचे संगीतकार बैठते थे। फिल्म के दृश्य के अनुसार वे हारमोनियम, तबला, वॉयलिन और सारंगी जैसे वाद्ययंत्रों पर लाइव संगीत बजाते थे। खुशी, दुख, रोमांच या डर जैसे भावों को संगीत के माध्यम से दर्शकों तक पहुंचाया जाता था।
पहली बोलती फिल्म और भारतीय सिनेमा का पहला गीत (1931)
साल 1931 भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक बड़ा मोड़ साबित हुआ, जब निर्देशक अर्देशिर ईरानी ने भारत की पहली बोलती फिल्म ‘आलम आरा’ बनाई।इसी फिल्म में अभिनेता वजीर मोहम्मद खान ने “दे दे खुदा के नाम पर प्यारे, अगर देने की चाहत है” गीत गाया, जिसे भारतीय सिनेमा का पहला आधिकारिक फिल्मी गीत माना जाता है।उस समय पार्श्व गायन (प्लेबैक सिंगिंग) की तकनीक उपलब्ध नहीं थी। इसलिए कलाकारों को कैमरे के सामने अभिनय करते हुए स्वयं गाना पड़ता था, जबकि संगीतकार और वादक कैमरे के फ्रेम से बाहर छिपकर लाइव संगीत बजाते थे।
पारसी थिएटर का प्रभाव और फिल्मों में गानों की भरमार
1930 के दशक की शुरुआती फिल्मों पर पारसी थिएटर और पारंपरिक नौटंकी का गहरा प्रभाव दिखाई देता है। उस दौर में दर्शक फिल्मों को एक संगीतमय नाटक के रूप में देखते थे।जहां ‘आलम आरा’ में 7 गीत थे, वहीं इसके बाद आई ‘शीरीं फरहाद’ (1931) में 42 गीत और ‘इंद्रसभा’ (1932) में रिकॉर्ड 69 गीत शामिल किए गए। यह भारतीय सिनेमा के इतिहास में सबसे अधिक गीतों वाली फिल्मों में गिनी जाती है।इसी दौर में फिल्मों में उन्हीं कलाकारों को प्राथमिकता दी जाती थी, जिन्हें अभिनय के साथ-साथ शास्त्रीय गायन भी आता हो। कुंदन लाल सहगल, सुरैया और नूरजहाँ ऐसे कलाकारों में प्रमुख थे।
पार्श्व गायन ने बदल दी भारतीय सिनेमा की तस्वीर (1935)
भारतीय फिल्म संगीत में सबसे बड़ा तकनीकी बदलाव वर्ष 1935 में आया, जब कोलकाता के न्यू थिएटर्स के बैनर तले बनी फिल्म ‘धूप छांव’ में पहली बार प्लेबैक सिंगिंग तकनीक का प्रयोग किया गया।निर्देशक नितिन बोस और संगीतकार पंकज मलिक ने इस तकनीक की शुरुआत की। अब गीत पहले स्टूडियो में रिकॉर्ड किए जाने लगे और अभिनेता पर्दे पर केवल लिप-सिंक करने लगे।इस बदलाव ने भारतीय सिनेमा को नई दिशा दी। अब ऐसे कलाकार भी बड़े अभिनेता बन सके, जिन्हें गायन नहीं आता था, जबकि पेशेवर पार्श्व गायकों के लिए भी नए अवसर खुल गए।
1950 और 1960 का दशक: भारतीय फिल्म संगीत का स्वर्ण युग
प्लेबैक सिंगिंग के स्थापित होने के बाद भारतीय फिल्म संगीत ने अपना स्वर्णिम दौर देखा।इसी समय लता मंगेशकर, मोहम्मद रफ़ी, किशोर कुमार, आशा भोंसले, मुकेश और मन्ना डे जैसे महान पार्श्व गायकों ने अपनी आवाज़ से करोड़ों लोगों का दिल जीता।=वहीं नौशाद, एस.डी. बर्मन, शंकर-जयकिशन और ओ.पी. नैय्यर जैसे संगीतकारों ने भारतीय शास्त्रीय संगीत और क्षेत्रीय लोकधुनों को आधुनिक फिल्म संगीत के साथ जोड़कर कई कालजयी रचनाएं तैयार कीं, जो आज भी उतनी ही लोकप्रिय हैं।
आधुनिक दौर में भारतीय संगीत की वैश्विक पहचान
1990 के दशक में संगीतकार ए.आर. रहमान के आगमन ने भारतीय फिल्म संगीत की ध्वनि, रिकॉर्डिंग तकनीक और संगीत संयोजन को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा दिया।उन्होंने 1992 में फिल्म ‘रोजा’ से भारतीय संगीत में आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक साउंड, सूफी संगीत और विश्व संगीत का अनूठा मेल प्रस्तुत किया, जिसने भारतीय फिल्म संगीत को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई।भारतीय सिनेमा को वैश्विक स्तर पर सबसे बड़ी उपलब्धि तब मिली, जब ए.आर. रहमान को फिल्म ‘स्लमडॉग मिलेनियर’ (2008) के लिए दो ऑस्कर पुरस्कार मिले।इसके बाद फिल्म ‘आरआरआर’ के लोकप्रिय गीत ‘नाटु नाटु’ ने सर्वश्रेष्ठ मूल गीत (Best Original Song) का ऑस्कर जीतकर भारतीय फिल्म संगीत को विश्व मंच पर एक नई पहचान दिलाई।
भारतीय फिल्म संगीत की विरासत
एक सदी से भी अधिक समय में भारतीय फिल्म संगीत ने कई तकनीकी और कलात्मक बदलाव देखे हैं। मूक फिल्मों के लाइव वादन से लेकर प्लेबैक सिंगिंग, स्वर्णिम दौर की कालजयी धुनों और आधुनिक डिजिटल संगीत तक, यह सफर लगातार विकसित होता रहा है।आज भारतीय फिल्म संगीत केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, भावनाओं और रचनात्मकता का वैश्विक प्रतिनिधि बन चुका है। यही कारण है कि भारतीय सिनेमा के गीत और संगीत देश ही नहीं, दुनिया भर के करोड़ों लोगों के दिलों में अपनी खास जगह बनाए हुए हैं।
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