October 10, 2026 1:23 pm

द्रौपदी मुर्मू: आदिवासी समाज से भारत की राष्ट्रपति बनने तक का सफर

द्रौपदी मुर्मू – भारत की राष्ट्रपति | Daily Insights

भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का जीवन संघर्ष, शिक्षा, सार्वजनिक सेवा और राजनीतिक यात्रा से जुड़ा है। ओडिशा के एक छोटे से गांव से निकलकर देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद तक पहुंचने वाली द्रौपदी मुर्मू ने भारतीय लोकतंत्र में एक महत्वपूर्ण स्थान बनाया है। वह भारत की 15वीं राष्ट्रपति, इस पद पर पहुंचने वाली दूसरी महिला और भारत के स्वतंत्र होने के बाद जन्म लेने वाली पहली राष्ट्रपति हैं। वह राष्ट्रपति बनने वाली पहली आदिवासी समुदाय की महिला भी हैं। उनकी यात्रा केवल राजनीति तक सीमित नहीं है। सरकारी विभाग में काम करने, शिक्षिका के रूप में विद्यार्थियों को पढ़ाने, विधायक और मंत्री बनने तथा झारखंड की राज्यपाल के रूप में जिम्मेदारी निभाने के बाद उन्होंने राष्ट्रपति पद तक का सफर तय किया।

शुरुआती जीवन और शिक्षा

द्रौपदी मुर्मू का जन्म 20 जून 1958 को ओडिशा के मयूरभंज जिले के उपरबेड़ा गांव में एक संथाल आदिवासी परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम बिरंची नारायण टुडू था। ग्रामीण परिवेश में पली-बढ़ीं मुर्मू के लिए उच्च शिक्षा हासिल करना आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी और भुवनेश्वर जाकर आगे की शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने रमादेवी महिला महाविद्यालय, भुवनेश्वर से कला में स्नातक की डिग्री हासिल की। वह अपने गांव से कॉलेज की शिक्षा प्राप्त करने वाली पहली महिला बनीं। उनकी शैक्षणिक यात्रा ने आगे चलकर सार्वजनिक सेवा और शिक्षा के क्षेत्र में उनकी रुचि को दिशा दी।

सरकारी नौकरी से शिक्षिका बनने तक

द्रौपदी मुर्मू ने अपने पेशेवर जीवन की शुरुआत सरकारी नौकरी से की। वर्ष 1979 से 1983 तक उन्होंने ओडिशा सरकार के सिंचाई एवं बिजली विभाग में कनिष्ठ सहायक के रूप में काम किया। इसके बाद 1994 से 1997 तक उन्होंने रायरंगपुर स्थित श्री अरबिंदो इंटीग्रल एजुकेशन सेंटर में मानद शिक्षिका के रूप में सेवाएं दीं। सरकारी विभाग और शिक्षा क्षेत्र में काम करने के इन अनुभवों ने उन्हें आम लोगों की समस्याओं और सामाजिक आवश्यकताओं को करीब से समझने का अवसर दिया।

पार्षद से शुरू हुई राजनीतिक यात्रा

द्रौपदी मुर्मू ने वर्ष 1997 में रायरंगपुर नगर पंचायत के पार्षद के रूप में अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की। इसी वर्ष वह भारतीय जनता पार्टी (BJP) से जुड़ीं और बाद में नगर पंचायत की उपाध्यक्ष भी बनीं। वर्ष 2000 में उन्होंने ओडिशा विधानसभा चुनाव में रायरंगपुर सीट से जीत हासिल की। वह 2000 से 2009 तक दो कार्यकालों के लिए विधायक रहीं। इस दौरान उन्होंने ओडिशा सरकार में वाणिज्य एवं परिवहन तथा मत्स्य पालन एवं पशु संसाधन विकास विभागों की स्वतंत्र प्रभार वाली राज्य मंत्री के रूप में जिम्मेदारी निभाई। वर्ष 2007 में उन्हें ओडिशा विधानसभा की ओर से पंडित नीलकंठ दास सर्वश्रेष्ठ विधायक पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह उनके राजनीतिक जीवन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव था।

झारखंड की पहली महिला राज्यपाल

18 मई 2015 को द्रौपदी मुर्मू ने झारखंड की राज्यपाल के रूप में शपथ ली। वह राज्य की पहली महिला राज्यपाल बनीं और जुलाई 2021 तक इस पद पर रहीं। उनके कार्यकाल में विश्वविद्यालयों की परीक्षा एवं भर्ती प्रक्रियाओं में सुधार और बालिका शिक्षा जैसे विषयों पर भी ध्यान दिया गया। राज्यपाल के रूप में उनका कार्यकाल राष्ट्रपति पद तक पहुंचने से पहले प्रशासनिक और संवैधानिक जिम्मेदारियों का महत्वपूर्ण अनुभव साबित हुआ

2022 में बनीं भारत की राष्ट्रपति

जून 2022 में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) ने द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार घोषित किया। 21 जुलाई 2022 को राष्ट्रपति चुनाव के परिणाम में उन्होंने विपक्ष के उम्मीदवार यशवंत सिन्हा को हराया। 25 जुलाई 2022 को उन्होंने भारत की 15वीं राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली। वह इस पद पर पहुंचने वाली पहली आदिवासी समुदाय की व्यक्ति, दूसरी महिला और स्वतंत्र भारत में जन्म लेने वाली पहली राष्ट्रपति बनीं। शपथ ग्रहण के समय उनकी उम्र 64 वर्ष थी। राष्ट्रपति के रूप में उनकी भूमिका भारतीय संविधान के अनुसार देश के संवैधानिक प्रमुख की है। इस पद पर वह संवैधानिक, औपचारिक और राष्ट्रीय महत्व की जिम्मेदारियां निभाती हैं।

निजी जीवन और संघर्ष

द्रौपदी मुर्मू के जीवन में व्यक्तिगत कठिनाइयां भी आईं। उनके पति श्याम चरण मुर्मू का 2014 में निधन हो गया। उन्होंने अपने परिवार में कई करीबी सदस्यों को भी खोया। इन अनुभवों के बावजूद उन्होंने सार्वजनिक जीवन में अपनी जिम्मेदारियां जारी रखीं। उनकी एक बेटी, इतिश्री मुर्मू हैं

एक गांव से राष्ट्रपति भवन तक

द्रौपदी मुर्मू की यात्रा शिक्षा, सरकारी सेवा, अध्यापन, राजनीति और संवैधानिक जिम्मेदारियों से होकर गुजरी है। उपरबेड़ा गांव से शुरू हुआ उनका सफर रायरंगपुर की स्थानीय राजनीति, ओडिशा सरकार, झारखंड के राजभवन और अंततः राष्ट्रपति भवन तक पहुंचा। उनका जीवन भारतीय लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व और सार्वजनिक सेवा की भूमिका को दर्शाता है। उनकी यात्रा विशेष रूप से उन महिलाओं और युवाओं के लिए प्रेरक उदाहरण है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद शिक्षा और मेहनत के जरिए सार्वजनिक जीवन में अपनी पहचान बनाना चाहते हैं।

व्यक्ति से व्यक्तित्व तक — Daily Insights

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