September 10, 2026 4:57 pm

गजराज राव: लंबे संघर्ष से ‘बधाई हो’ तक, किरदारों से बनाई अपनी पहचान

गजराज राव का अभिनय सफर और बधाई हो का यादगार किरदार

हिंदी सिनेमा में कुछ कलाकार ऐसे होते हैं जिनकी पहचान किसी एक फिल्म या किरदार से नहीं, बल्कि वर्षों की लगातार मेहनत से बनती है। गजराज राव भी ऐसे ही अभिनेता हैं, जिन्होंने छोटे-छोटे किरदारों से शुरुआत की और लंबे संघर्ष के बाद अपनी एक अलग पहचान बनाई।आज उन्हें खास तौर पर मिडिल-क्लास पिता के किरदारों की सहजता और विश्वसनीय अभिनय के लिए जाना जाता है। लेकिन इस पहचान के पीछे कई वर्षों का संघर्ष, थिएटर का अनुभव और ऐसे दौर की कहानी है, जब उन्हें बड़े मौके मिलने का इंतजार करना पड़ा।बैंडिट क्वीन, दिल से.., ब्लैक फ्राइडे, तलवार और रंगून जैसी फिल्मों में अलग-अलग भूमिकाएं निभाने के बाद बधाई हो’ ने उनके करियर को एक नई दिशा दी। जीतेन्द्र कौशिक के किरदार ने उन्हें घर-घर में पहचान दिलाई और इसके बाद उन्हें लगातार महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स मिलने लगे।

साधारण परिवार से अभिनय की दुनिया तक का सफर

गजराज राव का जन्म 31 दिसंबर 1970 को राजस्थान के डूंगरपुर में बताया जाता है। कुछ स्रोत उनके जन्म वर्ष को 1971 भी बताते हैं।उनके पिता रेलवे में क्लर्क थे और उनका बचपन रेलवे कॉलोनी के साधारण माहौल में बीता। आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत नहीं थी। गजराज राव ने अपने संघर्ष के दिनों के बारे में कई बार बात की है और बताया है कि उनके जीवन में ऐसे भी समय आए जब पैसों की बेहद कमी थी।कला और लेखन में उनकी रुचि धीरे-धीरे मजबूत होती गई। पढ़ाई के बाद उनका झुकाव थिएटर की ओर बढ़ा और यहीं से उनके अभिनय सफर की असली शुरुआत हुई।

16 साल की उम्र में थिएटर से जुड़ गए

गजराज राव ने कम उम्र में ही थिएटर की दुनिया में कदम रखा। करीब 16 साल की उम्र में वे दिल्ली के ‘Act One’ थिएटर ग्रुप से जुड़े।इस ग्रुप से जुड़े दौर में उनकी मुलाकात उन कलाकारों से भी हुई जो आगे चलकर भारतीय सिनेमा के बड़े नाम बने। मनोज बाजपेयी, आशीष विद्यार्थी और विजय राज जैसे कलाकारों के साथ थिएटर का अनुभव उनके लिए बेहद महत्वपूर्ण रहा।उन्होंने Jab Sheher Humara Sota Hai, Netua, Tughlaq और Andha Yug जैसे नाटकों में काम किया।थिएटर ने उन्हें केवल मंच पर संवाद बोलना नहीं सिखाया। इसने उन्हें किरदार को समझने, संवाद की लय पकड़ने, शरीर की भाषा इस्तेमाल करने और मंच पर मौजूदगी बनाए रखने की बारीकियां सिखाईं।बाद में फिल्मों में उनका सहज अभिनय इसी थिएटर प्रशिक्षण का महत्वपूर्ण परिणाम दिखाई दिया।

मुंबई में शुरू हुआ लंबा संघर्ष

थिएटर का अनुभव होने के बावजूद मुंबई में उन्हें तुरंत सफलता नहीं मिली।मुंबई आने के बाद उन्हें छोटे-मोटे काम और भूमिकाएं करनी पड़ीं। आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए उन्होंने अलग-अलग तरह के काम किए। उन्होंने दर्जी की दुकान में काम करने से लेकर गारमेंट कंपनी में नौकरी तक की।इसके अलावा उन्होंने नवभारत टाइम्स और हिंदुस्तान टाइम्स के लिए फ्रीलांस लेखन भी किया। दूरदर्शन के लिए एंकर की स्क्रिप्ट लिखने का काम भी उनके शुरुआती सफर का हिस्सा रहा।यही दौर उन्हें अलग-अलग लोगों और काम करने के तरीकों को समझने का अवसर देता रहा।गजराज राव ने अपने करियर के इस लंबे इंतजार को कई बार 25 से 30 साल के संघर्ष के रूप में याद किया है। लगातार काम करने के बावजूद उन्हें मुख्यधारा में बड़ी पहचान मिलने में लंबा समय लगा।उनका नजरिया भी इस संघर्ष के दौरान काफी महत्वपूर्ण रहा। उनका मानना रहा है कि लगातार निराशा और शिकायत किसी रचनात्मक यात्रा को आगे नहीं बढ़ाती।

बैंडिट क्वीन’ से फिल्मों में शुरुआत

गजराज राव ने 1994 में शेखर कपूर की ‘बैंडिट क्वीन’ से फिल्मों में कदम रखा। फिल्म में उन्होंने अशोक चंद ठाकुर की भूमिका निभाई।इसके बाद उन्हें कई फिल्मों में छोटी और सहायक भूमिकाएं मिलीं। दिल से.. में CBI ऑफिसर का किरदार हो या ब्लैक फ्राइडे में दाऊद फांसे की भूमिका—उनका काम धीरे-धीरे फिल्म निर्माताओं की नजर में आने लगा।2007 की नो स्मोकिंग, 2008 की आमिर और 2015 की तलवार जैसी फिल्मों ने उनकी अभिनय क्षमता के अलग-अलग पहलुओं को सामने रखा।खास तौर पर तलवार में इंस्पेक्टर धनीराम का किरदार उनके करियर की उन भूमिकाओं में शामिल रहा जिसने उन्हें गंभीर और भरोसेमंद चरित्र अभिनेता के रूप में मजबूत किया।

बधाई हो’ ने बदल दी पूरी तस्वीर

गजराज राव के करियर में सबसे बड़ा बदलाव 2018 की ‘बधाई हो’ से आया।अमित रविंद्रनाथ शर्मा की इस फिल्म में उन्होंने जीतेन्द्र कौशिक का किरदार निभाया। कहानी एक ऐसे परिवार के इर्द-गिर्द घूमती है जिसमें उम्रदराज माता-पिता के घर एक और बच्चे के आने की खबर पूरे परिवार को असहज स्थिति में डाल देती है।गजराज राव ने इस कहानी के केंद्र में मौजूद पिता को बेहद सहज तरीके से निभाया।उनका किरदार न तो जरूरत से ज्यादा भावुक था और न ही हर सीन में कॉमेडी करने की कोशिश करता था। वह एक सामान्य मिडिल-क्लास पिता जैसा दिखाई देता था—जिसमें झिझक भी थी, परिवार की चिंता भी और परिस्थितियों से पैदा होने वाली हास्यास्पद स्थिति भी।

नीना गुप्ता के साथ जोड़ी बनी खास

बधाई हो में गजराज राव और नीना गुप्ता की जोड़ी को दर्शकों ने काफी पसंद किया।दोनों के बीच पति-पत्नी के रिश्ते को जिस सहजता से दिखाया गया, वह फिल्म की बड़ी ताकत बनी। उनके सीन किसी फिल्मी जोड़ी की तरह कम और एक वास्तविक मध्यमवर्गीय दंपति की तरह ज्यादा महसूस होते थे।यही relatability गजराज राव के अभिनय की खास पहचान बनी।दर्शकों को उनके किरदार में अपना परिवार, अपने माता-पिता या अपने आसपास के लोगों की झलक दिखाई दी।

बधाई हो’ के बाद मिली मुख्यधारा की पहचान

बधाई हो के बाद गजराज राव के करियर की गति काफी बदल गई।2019 में लव पर स्क्वायर फुट और मेड इन चाइना जैसी फिल्मों में नजर आने के बाद उन्होंने 2020 में शुभ मंगल ज्यादा सावधान’ में शंकर त्रिपाठी का किरदार निभाया।इसके अलावा लूटकेस, गिल्टी और बाद के वर्षों में मैदान, दब्बा कार्टेल और दुपहिया जैसे प्रोजेक्ट्स में भी उन्होंने काम किया।इस दौर में उन्हें सिर्फ “सपोर्टिंग एक्टर” के रूप में नहीं देखा गया, बल्कि फिल्म की कहानी के महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में उनकी मौजूदगी को महत्व मिलने लगा।

OTT ने भी दिखाए अभिनय के नए रंग

गजराज राव का अभिनय सिर्फ फिल्मों तक सीमित नहीं रहा। डिजिटल प्लेटफॉर्म और वेब सीरीज में भी उन्होंने अलग-अलग भूमिकाएं निभाईं।‘F.A.T.H.E.R.S.’ और ‘Tech Conversations with Dad’ जैसे TVF प्रोजेक्ट्स में उन्होंने पिता के किरदारों को अलग अंदाज में पेश किया।PariWar में उन्होंने एक परिवार के मुखिया की भूमिका निभाई, जबकि Ray में भी वे नजर आए।OTT के दौर ने उन्हें ऐसे किरदार चुनने का अवसर दिया जिनमें पारंपरिक बॉलीवुड फॉर्मूले के बजाय चरित्र और कहानी को अधिक महत्व दिया जाता है।

गजराज राव को ‘फेवरेट बाप’ क्यों कहा जाने लगा?

गजराज राव की सबसे बड़ी ताकत उनका सहज अभिनय है।वे किसी किरदार को बहुत ज्यादा नाटकीय बनाने के बजाय उसे सामान्य इंसान की तरह पेश करते हैं। यही वजह है कि उनके पिता वाले किरदार दर्शकों को आसानी से अपने आसपास के लोगों से जुड़े हुए लगते हैं।उनके अभिनय की कुछ प्रमुख खूबियां हैं—

सहजता: वे बिना ओवरएक्टिंग के भावनाओं को व्यक्त करते हैं।

आवाज और संवाद: उनकी आवाज का उतार-चढ़ाव किरदार की सामाजिक और मानसिक स्थिति को दर्शाता है।

रिलेटेबिलिटी: उनके किरदारों में आम भारतीय परिवारों और मिडिल-क्लास जिंदगी की झलक दिखाई देती है।

कॉमेडी और ड्रामा का संतुलन: वे एक ही किरदार में हास्य और भावनात्मक गहराई दोनों ला सकते हैं।

यही खूबियां उन्हें सिर्फ कॉमेडी अभिनेता बनने से आगे ले जाती हैं।

आँखों देखी’ से ‘मसान’ तक गंभीर अभिनय

गजराज राव की पहचान केवल बधाई हो या पिता के किरदारों तक सीमित नहीं है।उन्होंने आँखों देखी’ जैसी फिल्म में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जहां कहानी और किरदार दोनों ही पारंपरिक व्यावसायिक सिनेमा से अलग थे।इसी तरह मसान’ में भी उनके अभिनय ने भावनात्मक स्तर पर असर छोड़ा।इन फिल्मों ने यह साबित किया कि गजराज राव सिर्फ दर्शकों को हंसाने वाले अभिनेता नहीं हैं। वे खामोशी, चेहरे के भाव और नियंत्रित अभिनय के जरिए गंभीर परिस्थितियों को भी प्रभावशाली बना सकते हैं।

संघर्ष के दौरान अभिनय से बनाई अपनी राह

गजराज राव की कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा यह है कि उनकी सफलता अचानक नहीं आई।उन्होंने लंबे समय तक छोटे किरदार किए, लेखन से जुड़े काम किए, थिएटर किया और आर्थिक मुश्किलों का सामना किया। इसके बावजूद उन्होंने अभिनय को छोड़ने के बजाय लगातार अपनी कला पर काम किया।उनके करियर में यह बात साफ दिखाई देती है कि छोटा रोल भी अभिनेता के लिए बड़ा अवसर हो सकता है, अगर वह उसे पूरी ईमानदारी से निभाए।

छोटे किरदारों से बड़ी पहचान तक

गजराज राव का सफर हिंदी सिनेमा में उन कलाकारों की कहानी है जिन्होंने स्टारडम के पारंपरिक रास्ते के बजाय किरदारों के जरिए अपनी पहचान बनाई।बैंडिट क्वीन से शुरू हुआ सफर दिल से.., ब्लैक फ्राइडे और तलवार जैसी फिल्मों से गुजरता हुआ बधाई हो तक पहुंचा। इसके बाद उन्होंने शुभ मंगल ज्यादा सावधान, लूटकेस, मैदान और OTT के कई प्रोजेक्ट्स में अपनी अभिनय क्षमता के अलग-अलग रंग दिखाए।आज गजराज राव की पहचान एक ऐसे अभिनेता के रूप में है जो किरदार को बड़ा बनाने के लिए खुद को बड़ा दिखाने की कोशिश नहीं करता।शायद यही उनके अभिनय की सबसे बड़ी खूबी है—वे पर्दे पर स्टार बनने की कोशिश नहीं करते, बल्कि अपने किरदार को इतना सच्चा बना देते हैं कि दर्शक उसे याद रखने लगते हैं।

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