July 22, 2026 10:17 am

भारत की भाषा समस्या के अंदर

Inside India’s language conundrum

नई दिल्ली। कक्षा 6 से राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तीन-भाषा सूत्र को लागू करने के केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) के फैसले ने पूरे भारत में विवाद और भ्रम की स्थिति पैदा कर दी है। इस नीति के क्रियान्वयन के दौरान अनेक शिक्षक अपने पद से हटाए गए, पाठ्यक्रम में व्यवधान आया और माता-पिता, छात्र तथा विदेशों के दूतावासों ने अपनी चिंता व्यक्त की है।

CBSE ने इस तीन-भाषा सूत्र के तहत छात्रों को हिंदी, अंग्रेज़ी तथा स्थानीय भाषा या दूसरी भाषा का अध्ययन करना अनिवार्य किया है। हालांकि, देश की विविध भाषाई संरचना को देखते हुए इस नीति को स्वीकार करना कई राज्यों और विद्यार्थियों के लिए चुनौती बना हुआ है। कई जगहों पर संसाधनों की कमी, प्रशिक्षित शिक्षकों की अनुपलब्धता और भाषा को लेकर असहमति ने इसे और जटिल कर दिया है।

बच्चों के अभिभावकों ने कहा है कि उनकी संतानों की पढ़ाई पर इस अचानक बदलाव का बुरा असर पड़ा है। कई अभिभावक यह मानते हैं कि उनकी बच्चों की मातृभाषा को प्राथमिकता नहीं मिल रही, जिससे उनकी शैक्षिक प्रगति प्रभावित हो सकती है। वहीं, छात्रों के लिए तीन नई भाषाएँ सीखना एक भारी बोझ सा बन गया है, खासकर उन इलाकों में जहां स्थानीय भाषा को तरजीह दी जाती है।

विदेशी दूतावासों ने भी इस नीति पर आपत्ति दर्ज कराई है, खासकर उन देशों के छात्रों की पढ़ाई को लेकर जहां वे स्थानीय बोर्ड के छात्र नहीं हैं। उनकी दलील है कि तीन-भाषा सूत्र की अनिवार्यता से विदेशी छात्रों की भाषा सीखने में कठिनाई होगी और उनका अकादमिक प्रदर्शन प्रभावित हो सकता है।

शिक्षकों की समस्याएँ भी कम नहीं हैं। शिक्षकों की कमी और उनके पदों का डाटा अपडेट न होना कई स्कूलों में संकट पैदा कर रहा है। शिक्षक असमंजस में हैं कि उन्हें किस भाषा की पढ़ाई करानी है और वे अपने कर्तव्यों का निर्वाह किस तरह करें।

शिक्षा विशेषज्ञ इस क़दम को अच्छी पहल तो मानते हैं, लेकिन सही योजना और व्यापक समझ के बिना इसे लागू करना चुनौतीपूर्ण है। उनका कहना है कि तीन-भाषा नीति का उद्देश्य देश की सामजिक और भाषाई एकता को बढ़ावा देना है, लेकिन इसे सफल बनाने के लिए प्रदेशों की भौगोलिक, भाषाई और सांस्कृतिक विविधता को ध्यान में रखना होगा।

मौजूदा हालात में, CBSE सहित संबंधित विभागों से उम्मीद है कि वे शीघ्र ही स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करेंगे, ताकि इस भाषा विवाद से उत्पन्न शिक्षा संकट का समाधान निकाला जा सके और विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दी जा सके।

मईत्री पोरेचा की रिपोर्ट।

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