October 27, 2026 2:08 pm

ओम बिरला : राजनीतिक सफर और लोकसभा अध्यक्ष की भूमिका

ओम बिरला का जीवन परिचय और लोकसभा अध्यक्ष के रूप में भूमिका

भारतीय लोकतंत्र में लोकसभा अध्यक्ष का पद अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यह पद केवल सदन की कार्यवाही संचालित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि संसद की गरिमा बनाए रखने, सदस्यों को अपनी बात रखने का अवसर देने और संसदीय नियमों का पालन सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी भी इससे जुड़ी होती है। ओम बिरला भारतीय राजनीति के उन नेताओं में शामिल हैं, जिन्होंने राजस्थान की विधानसभा से अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत की और आगे चलकर देश की संसद के सर्वोच्च पीठासीन पदों में से एक, लोकसभा अध्यक्ष, की जिम्मेदारी संभाली। राजस्थान के कोटा से आने वाले ओम बिरला भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं। वे वर्ष 2014 से कोटा लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं और जून 2019 में पहली बार 17वीं लोकसभा के अध्यक्ष चुने गए। जून 2024 में वे लगातार दूसरी बार इस पद पर निर्वाचित हुए। उनका राजनीतिक सफर संगठनात्मक गतिविधियों, विधानसभा के अनुभव और संसदीय कार्यप्रणाली से जुड़ा रहा है।

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

ओम बिरला का जन्म 23 नवंबर 1962 को राजस्थान के कोटा में हुआ। उनके पिता का नाम श्रीकृष्ण बिरला और माता का नाम शकुंतला देवी था। वे मारवाड़ी हिंदू परिवार से संबंध रखते हैं। राजस्थान में पले-बढ़े ओम बिरला ने अपनी शिक्षा के दौरान वाणिज्य विषय में रुचि विकसित की, जो आगे चलकर उनके सार्वजनिक जीवन का आधार बनी। उन्होंने कोटा के गवर्नमेंट कॉमर्स कॉलेज से शिक्षा प्राप्त की और महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय, अजमेर से वाणिज्य में स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की। उनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि ने उन्हें आर्थिक और सामाजिक विषयों को समझने का अवसर दिया। वर्ष 1991 में उनका विवाह अमिता बिरला से हुआ। उनकी दो बेटियाँ हैं, जिनके नाम आकांक्षा और अंजलि हैं। पारिवारिक जीवन के साथ-साथ उन्होंने राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियों में अपनी सक्रियता बनाए रखी।

राजनीतिक सफर की शुरुआत

ओम बिरला ने राजनीति में अपनी पहचान भारतीय जनता युवा मोर्चा के माध्यम से बनाई। उन्होंने कोटा में युवा मोर्चा के जिला अध्यक्ष के रूप में कार्य किया और बाद में राजस्थान में संगठन के प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाली। वर्ष 1997 से 2003 के बीच वे भारतीय जनता युवा मोर्चा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भी रहे। संगठनात्मक राजनीति के इस दौर में उन्हें कार्यकर्ताओं के साथ काम करने, जनसंपर्क बढ़ाने और राजनीतिक गतिविधियों के संचालन का अनुभव मिला। यही अनुभव आगे चलकर उनके चुनावी और विधायी सफर में उपयोगी साबित हुआ।
ओम बिरला ने वर्ष 2003 में राजस्थान विधानसभा चुनाव में कोटा दक्षिण सीट से चुनाव लड़ा और कांग्रेस के उम्मीदवार शांति धारीवाल को 10,101 मतों से हराकर पहली बार विधायक बने। वर्ष 2008 में उन्होंने फिर चुनाव जीतकर अपनी सीट बरकरार रखी। इस बार उन्होंने कांग्रेस के रामकिशन वर्मा को 24,300 मतों के अंतर से पराजित किया।
वर्ष 2003 से 2008 के बीच उन्होंने राजस्थान सरकार में संसदीय सचिव के रूप में भी काम किया। वर्ष 2013 में वे तीसरी बार कोटा दक्षिण से विधायक निर्वाचित हुए। इस चुनाव में उन्होंने कांग्रेस के पंकज मेहता को बड़े अंतर से हराया। विधानसभा में लगभग एक दशक के अनुभव ने उन्हें विधायी प्रक्रियाओं और जनप्रतिनिधि की जिम्मेदारियों को समझने का अवसर दिया।

लोकसभा में प्रवेश

वर्ष 2014 में ओम बिरला ने भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार के रूप में कोटा लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। इसके साथ ही उनका राजनीतिक सफर राज्य की राजनीति से राष्ट्रीय स्तर तक पहुंच गया। वे 16वीं, 17वीं और 18वीं लोकसभा के लिए कोटा से निर्वाचित हुए। संसद में अपने शुरुआती कार्यकाल के दौरान वे ऊर्जा संबंधी स्थायी समिति और सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय की परामर्शदात्री समिति से जुड़े रहे। वर्ष 2014 के बाद से कोटा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हुए उन्होंने राष्ट्रीय राजनीति में अपनी भूमिका मजबूत की। लोकसभा सदस्य के रूप में उनका अनुभव आगे चलकर सदन की कार्यवाही संचालित करने की जिम्मेदारी में महत्वपूर्ण रहा।

लोकसभा अध्यक्ष के रूप में भूमिका

19 जून 2019 को ओम बिरला 17वीं लोकसभा के अध्यक्ष चुने गए। यह उनके राजनीतिक जीवन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव था। लोकसभा अध्यक्ष का दायित्व सदन की कार्यवाही को नियमों के अनुसार संचालित करना, संसदीय मर्यादा बनाए रखना और विभिन्न राजनीतिक दलों के सदस्यों को सदन में अपनी बात रखने का अवसर देना है।
उनके पहले कार्यकाल के दौरान संसद में कई विधेयक पारित हुए। हालांकि, दिसंबर 2023 में विपक्षी सांसदों के बड़े पैमाने पर निलंबन की घटना को लेकर उन्हें आलोचनाओं का सामना भी करना पड़ा। इस घटना ने संसदीय अनुशासन, विपक्ष की भागीदारी और सदन की कार्यवाही से जुड़े सवालों को चर्चा में ला दिया।जून 2024 में ओम बिरला को 18वीं लोकसभा का अध्यक्ष फिर से चुना गया। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के उम्मीदवार के रूप में उनका निर्वाचन ध्वनिमत से हुआ। लगातार दूसरी बार लोकसभा अध्यक्ष चुने जाने के साथ वे उन चुनिंदा नेताओं में शामिल हो गए, जिन्होंने यह जिम्मेदारी दो बार संभाली है। वर्ष 2026 में उनके पद को लेकर विपक्षी सांसदों ने हटाने का प्रस्ताव भी प्रस्तुत किया। उपलब्ध विवरण के अनुसार, इस प्रस्ताव पर मार्च 2026 में चर्चा हुई और 11 मार्च को ध्वनिमत से प्रस्ताव खारिज कर दिया गया। यह घटनाक्रम लोकसभा अध्यक्ष के पद से जुड़े संवैधानिक प्रावधानों और संसदीय प्रक्रिया की अहमियत को रेखांकित करता है।

संगठनात्मक अनुभव और सार्वजनिक जीवन

ओम बिरला का राजनीतिक जीवन केवल चुनाव जीतने और संवैधानिक पदों तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने युवा मोर्चा में जिला, प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर पर जिम्मेदारियाँ निभाईं। वे राष्ट्रीय सहकारी उपभोक्ता महासंघ के उपाध्यक्ष और जयपुर में CONFED के अध्यक्ष जैसे पदों पर भी रहे। इन जिम्मेदारियों ने उन्हें संगठन, सहकारिता और सार्वजनिक संस्थाओं के कामकाज का अनुभव दिया। विधानसभा और लोकसभा में लंबे कार्यकाल ने उनके राजनीतिक सफर को एक व्यापक स्वरूप प्रदान किया।

ओम बिरला का जीवन परिचय राजस्थान की क्षेत्रीय राजनीति से राष्ट्रीय संसदीय नेतृत्व तक की यात्रा को दर्शाता है। कोटा दक्षिण से तीन बार विधायक बनने, वर्ष 2014 से लोकसभा में प्रतिनिधित्व करने और लगातार दो बार लोकसभा अध्यक्ष चुने जाने तक उनका सफर कई महत्वपूर्ण पड़ावों से गुजरा है। लोकसभा अध्यक्ष के रूप में उनकी भूमिका भारतीय लोकतंत्र, संसदीय परंपराओं और सदन की कार्यवाही से सीधे जुड़ी हुई है। उनके कार्यकाल में उपलब्धियों के साथ आलोचनाएँ और राजनीतिक बहसें भी सामने आईं, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा हैं। उनका राजनीतिक सफर इस बात का उदाहरण है कि संगठनात्मक अनुभव और विधायी कार्य से जुड़ाव किसी नेता को राष्ट्रीय स्तर की महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों तक पहुंचा सकता है।

Political  Desk | daily Insights

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