September 23, 2026 1:44 pm

अतुल कुलकर्णी: भाषा और शैली की सीमाओं से परे दमदार अभिनय

अतुल कुलकर्णी का अभिनय और थिएटर सफर

अतुल कुलकर्णी भारतीय सिनेमा के उन कलाकारों में हैं जिनकी पहचान किसी एक भाषा, शैली या किरदार तक सीमित नहीं रही। हिंदी और मराठी फिल्मों के साथ उन्होंने तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम और अंग्रेजी सिनेमा में भी काम किया है। उनके अभिनय की खासियत यह है कि वे किरदार को केवल निभाने के बजाय उसकी सोच, व्यवहार और परिस्थितियों को समझने की कोशिश करते हैं।थिएटर उनके अभिनय की मजबूत नींव रहा है। यही वजह है कि पर्दे पर वे कभी पुलिस अधिकारी, कभी राजनेता, कभी साधारण व्यक्ति तो कभी किसी जटिल और नकारात्मक किरदार के रूप में नजर आते हैं, लेकिन हर भूमिका में उनका अंदाज अलग दिखाई देता है।

बेलगाम से सोलापुर तक शुरू हुआ सफर

अतुल कुलकर्णी का जन्म 10 सितंबर 1965 को कर्नाटक के बेलगाम में हुआ। उनके पिता व्यवसायी और मां गृहिणी थीं। उनका परिवार मूल रूप से महाराष्ट्र के सोलापुर का था, जहां उनका पालन-पोषण और शिक्षा हुई।बचपन से ही अतुल कुलकर्णी की रुचि अभिनय और प्रदर्शन कला में थी। करीब 10 साल की उम्र में उन्होंने स्कूली नाटक में बाल कलाकार के रूप में हिस्सा लिया। यह अनुभव आगे चलकर उनके अभिनय के प्रति बढ़ते आकर्षण की शुरुआत बना।कॉलेज के दिनों में उन्होंने पुणे के COEP (College of Engineering, Pune) में इंजीनियरिंग की पढ़ाई शुरू की। लेकिन उन्हें जल्द ही महसूस हुआ कि उनकी वास्तविक रुचि इंजीनियरिंग के बजाय साहित्य, कला और अभिनय में है। इसके बाद उन्होंने इंजीनियरिंग छोड़कर सोलापुर के D.A.V. कॉलेज में अंग्रेजी साहित्य की पढ़ाई शुरू की।

थिएटर ने बदली जिंदगी की दिशा

सोलापुर में रहते हुए अतुल कुलकर्णी नाट्य आराधना नाम के थिएटर ग्रुप से जुड़े। यहां उन्हें डॉ. वामन देगांवकर का मार्गदर्शन मिला। शुरुआत में उन्होंने करीब दो साल तक बैकस्टेज का काम किया और इसके बाद मंच पर अभिनय का अवसर मिला।थिएटर ने उन्हें केवल अभिनय करना नहीं सिखाया, बल्कि मंच के पीछे की पूरी प्रक्रिया को समझने का अवसर भी दिया। बाद में यही अनुभव उनके अभिनय की शैली का महत्वपूर्ण हिस्सा बना।उनकी महत्वपूर्ण शुरुआती भूमिकाओं में गांधी विरुद्ध गांधी’ नाटक में महात्मा गांधी का किरदार भी शामिल रहा। इस नाटक ने अभिनेता और फिल्मकार कमल हासन का ध्यान उनकी ओर खींचा।

NSD ने अभिनय को दिया नया आकार

1995 में अतुल कुलकर्णी ने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (NSD), दिल्ली से स्नातक किया। यहां उन्होंने अभिनय के साथ-साथ स्टेजक्राफ्ट, लाइटिंग, स्केचिंग, कारपेंट्री, कॉस्ट्यूम डिजाइन और संगीत जैसी थिएटर की अलग-अलग तकनीकों को भी समझा।NSD के बाद वे मुंबई पहुंचे। शुरुआत में फिल्मों में काम पाना आसान नहीं था, लेकिन थिएटर का काम उन्हें लगातार मिलता रहा। इसी दौर ने उन्हें मंच और सिनेमा दोनों की अलग-अलग जरूरतों को समझने का अवसर दिया।मुंबई आने के कुछ ही समय बाद उन्हें अपना पहला पेशेवर नाटक मिला। यह नाटक तीन भाषाओं में किया गया था और इसी के बारे में कमल हासन को जानकारी मिली। आगे चलकर यही संपर्क उन्हें हे राम तक ले गया।

हे राम’ से फिल्मी करियर की शुरुआत

2000 में कमल हासन की फिल्म हे राम’ रिलीज हुई। इसमें अतुल कुलकर्णी ने श्रीराम अभ्यंकर की भूमिका निभाई। फिल्म की कहानी हिंसा और कट्टर विचारधारा की ओर बढ़ते एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द थी।यह भूमिका आसान नहीं थी। किरदार की विचारधारा, हिंसा की क्षमता और उसके भीतर मौजूद नैतिक जटिलता को पर्दे पर विश्वसनीय बनाना जरूरी था। अतुल कुलकर्णी ने इस भूमिका में सूक्ष्म और आंतरिक अभिनय पर जोर दिया।हे राम उनके लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण रही क्योंकि इसी फिल्म के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का सम्मान मिला।

चांदनी बार’ में संवेदनशील किरदार

2001 में मधुर भंडारकर की चांदनी बार’ में अतुल कुलकर्णी ने पोत्या का किरदार निभाया। फिल्म मुंबई के बार में काम करने वाली एक नृत्यांगना की कहानी पर आधारित थी।इस भूमिका में प्रेम, चिंता, आर्थिक संघर्ष और भावनात्मक असुरक्षा जैसे कई पहलू थे। अतुल कुलकर्णी ने किरदार को केवल सहायक भूमिका के रूप में नहीं निभाया, बल्कि उसके भीतर मौजूद भावनात्मक संघर्ष को भी सामने रखा।इस फिल्म के लिए उन्हें एक बार फिर राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का सम्मान मिला। लगातार दो फिल्मों में इस सम्मान तक पहुंचना उनके अभिनय सफर का महत्वपूर्ण पड़ाव रहा।

पेज 3’ और सामाजिक नजरिया

2005 में आई मधुर भंडारकर की पेज 3’ में अतुल कुलकर्णी ने पत्रकार की भूमिका निभाई। फिल्म मीडिया और सेलिब्रिटी संस्कृति की दुनिया को सामने रखती है।इस भूमिका में पत्रकार की जिम्मेदारी, मीडिया की जटिलताएं और टीम के प्रति उसकी प्रतिबद्धता जैसे पहलू दिखाई देते हैं। अतुल कुलकर्णी ने इस किरदार को भी सहज तरीके से प्रस्तुत किया।

रंग दे बसंती’ से युवा दर्शकों तक पहुंच

2006 की रंग दे बसंती’ में अतुल कुलकर्णी ने लक्ष्मण पांडे की भूमिका निभाई। फिल्म में युवा पीढ़ी, दोस्ती और देशभक्ति के भाव को प्रमुखता दी गई थी।इस भूमिका में हास्य, दोस्ती, टीम के प्रति वफादारी और परिस्थितियों के साथ बदलती सोच जैसे पहलू दिखाई दिए। फिल्म की लोकप्रियता ने अतुल कुलकर्णी के अभिनय को बड़े दर्शक वर्ग तक पहुंचाया।

नटरंग’ से मराठी सिनेमा में मजबूत पहचान

2010 में जब्बार पटेल की मराठी फिल्म नटरंग’ में अतुल कुलकर्णी ने गुणा कागलकर की भूमिका निभाई। यह एक ऐसे कलाकार की कहानी थी जो तमाशा कला की दुनिया में अपनी पहचान बनाना चाहता है।इस किरदार में कला के प्रति लगाव, आर्थिक और भावनात्मक संघर्ष तथा समाज के बीच अपनी जगह बनाने की कोशिश जैसे पहलू दिखाई दिए। अतुल कुलकर्णी ने भूमिका को संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया।नटरंग के लिए उन्हें महाराष्ट्र राज्य फिल्म पुरस्कार भी मिला।

वैलू’ में अलग तरह की भूमिका

उसी दौर में 2010 की मराठी फिल्म वैलू’ में उन्होंने स्वानंद गड्डमवार का किरदार निभाया। फिल्म एक ऐसे किसान की कहानी पर आधारित थी जो आत्महत्या करने की कोशिश करता है।यह भूमिका उनके पहले के कई किरदारों से अलग थी। इसमें ग्रामीण जीवन, आर्थिक और भावनात्मक संघर्ष तथा सामाजिक परिस्थितियों के दबाव को समझना महत्वपूर्ण था।फिल्म को फ्रांस के ला रोशेल अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में भी प्रदर्शित किया गया था।

सिटी ऑफ ड्रीम्स’ से OTT पर नई पहचान

2019 में नागेश कुकनूर की वेब सीरीज सिटी ऑफ ड्रीम्स’ में अतुल कुलकर्णी ने अमेय राव गायकवाड़ की भूमिका निभाई। यह किरदार राजनीति और सत्ता के संघर्ष से जुड़ा था।इस भूमिका में सत्ता, प्रभाव, महत्वाकांक्षा और नैतिक जटिलता जैसे पहलू दिखाई दिए। OTT के बढ़ते प्रभाव के दौर में इस भूमिका ने अतुल कुलकर्णी को नई पीढ़ी के दर्शकों के बीच भी पहचान दिलाई।उनके लिए यह भूमिका इसलिए भी खास थी क्योंकि इसमें एक ऐसे व्यक्ति की कहानी थी जो कभी मजबूत स्थिति में था, लेकिन बदलती परिस्थितियों में खुद को कमजोर स्थिति में पाता है।

सात भाषाओं में काम करने वाला अभिनेता

अतुल कुलकर्णी ने हिंदी, मराठी, तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम और अंग्रेजी फिल्मों में काम किया है। उनके लिए भाषा महत्वपूर्ण जरूर है, लेकिन कहानी और किरदार उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।उनके अनुसार अपनी परिचित भाषा में काम करना स्वाभाविक रूप से आसान होता है, लेकिन उन्होंने अलग-अलग भाषाओं में काम करने के लिए अपनी तैयारी और तकनीक विकसित की है।उनका नजरिया साफ है—किसी फिल्म की भाषा या शैली से पहले उसके कहानी और किरदार का प्रभाव उन्हें आकर्षित करता है।

थिएटर आज भी है उनका मूल आधार

अतुल कुलकर्णी के लिए थिएटर केवल करियर की शुरुआत नहीं है। वह आज भी उनके अभिनय का मूल आधार है। वे अभिनय को एक शिल्प मानते हैं और थिएटर को ऐसा माध्यम मानते हैं जहां कलाकार लगातार सीख और सुधार सकता है।मंच पर कलाकार को दर्शकों की सीधी प्रतिक्रिया मिलती है। हर प्रदर्शन के बाद वह अपने काम में बदलाव कर सकता है। इसके विपरीत फिल्म में शूटिंग पूरी होने के बाद अभिनेता अपने प्रदर्शन को बदल नहीं सकता।इसी वजह से थिएटर उनके लिए लगातार सीखने और खुद को बेहतर बनाने का माध्यम बना हुआ है। फिल्मों और टेलीविजन के प्रोजेक्ट्स के जरिए वे अपने थिएटर के जुड़ाव को भी बनाए रखते हैं।

किरदार में पूरी तरह घुल जाने की कला

अतुल कुलकर्णी की अभिनय शैली की सबसे बड़ी विशेषता किरदार में पूरी तरह घुल जाना है। वे इस बात पर ज्यादा ध्यान देते हैं कि दर्शक अभिनेता को पहचानने के बजाय किरदार को महसूस करे।उनकी तैयारी में किरदार की सामाजिक स्थिति, भाषा, व्यवहार और पृष्ठभूमि को समझना महत्वपूर्ण रहता है। बेलगाम और सोलापुर से लेकर थिएटर, NSD और बहुभाषी सिनेमा तक का अनुभव उनके अभिनय को अलग गहराई देता है।यही वजह है कि उनके करियर में कट्टरवादी व्यक्ति से लेकर पुलिस अधिकारी, राजनेता, पत्रकार, किसान, कलाकार और आम इंसान तक कई अलग-अलग तरह के किरदार दिखाई देते हैं।अतुल कुलकर्णी की अभिनय यात्रा यह दिखाती है कि किसी कलाकारकी पहचान केवल मुख्य भूमिका या स्क्रीन टाइम से तय नहीं होती। किरदार को कितनी सच्चाई और गहराई से निभाया गया है, यह उसकी पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है।भाषा बदलने के बावजूद अतुल कुलकर्णी की अभिनय शैली में एक बात लगातार दिखाई देती है—कहानी और किरदार को प्राथमिकता देना। यही सोच उन्हें थिएटर से लेकर हिंदी, मराठी और दूसरी भाषाओं के सिनेमा और OTT तक एक अलग पहचान देती है।

ENTERTAINMENT DESK | DAILY INSIGHTS

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