September 15, 2026 4:07 pm

बृजेंद्र काला: कुछ मिनटों के किरदार को भी यादगार बनाने की कला

बृजेंद्र काला के यादगार किरदार और अभिनय सफर

बृजेंद्र काला उन कलाकारों में हैं जिनकी पहचान उनके स्क्रीन-टाइम से नहीं, बल्कि स्क्रीन-इम्पैक्ट से होती है। फिल्म में उनका किरदार कुछ ही मिनटों के लिए दिखाई दे, लेकिन उनकी आवाज़, चेहरे के भाव, संवाद बोलने का अंदाज़ और सहज बॉडी लैंग्वेज दर्शकों को लंबे समय तक याद रहती है। उनकी खासियत यह है कि वे छोटे किरदार को सिर्फ निभाते नहीं, बल्कि उसमें एक पूरा व्यक्तित्व और जीवन भर देते हैं।

छोटे शहर से थिएटर तक का सफर

बृजेंद्र काला का जन्म उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले के सुमारी गाँव में हुआ। बचपन से ही उन्हें अभिनय और संगीत में दिलचस्पी थी। स्कूल के दिनों में वे आकाशवाणी मथुरा के बालगोपाल और युववाणी जैसे कार्यक्रमों में प्रस्तुति देते थे। इसी दौरान उनकी मुलाकात लेखिका अचला नगर से हुई, जो आगे चलकर उनकी मार्गदर्शक बनीं।उनके अभिनय की मजबूत नींव थिएटर में पड़ी। अचला नगर के स्वस्तिक रंगमंडल के साथ उन्होंने करीब 17–18 साल तक दिल्ली, लखनऊ और मुंबई सहित अलग-अलग शहरों में नाटक किए। उन्होंने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (NSD) और श्रीराम सेंटर फॉर परफॉर्मिंग आर्ट्स में दाखिले की कोशिश भी की, लेकिन दोनों बार सफलता नहीं मिली। इसके बाद उन्होंने मुंबई जाने का फैसला किया।

मुंबई में संघर्ष और छोटे कामों से शुरुआत

1992 में मुंबई पहुंचने के बाद बृजेंद्र काला के लिए फिल्मी दुनिया में जगह बनाना आसान नहीं था। वे संदर्भ पत्र लेकर निर्माताओं के पास जाते, लेकिन अक्सर उन्हें यही सुनने को मिलता कि फिल्मों में पहले से बड़े कलाकार मौजूद हैं और छोटे कलाकारों के लिए जगह नहीं है।इस दौर में उन्होंने खुद को सिर्फ अभिनेता तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने निर्देशकों की सहायता की, टेलीविजन धारावाहिकों के लिए संवाद लिखे और कहानी घर घर की जैसे शो की राइटिंग से भी जुड़े। स्टार बेस्टसेलर्स के लिए उन्होंने एक एपिसोड लिखा, जिसे तिग्मांशु धूलिया ने निर्देशित किया। साथ ही छोटे टीवी रोल भी किए।2003 में तिग्मांशु धूलिया की फिल्म हासिल से उन्हें बड़े पर्दे पर शुरुआती मौका मिला। इसमें उन्होंने अखबार बेचने वाले की छोटी भूमिका निभाई।

जब वी मेट’ ने दिखाई उनकी खास पहचान

2007 की जब वी मेट बृजेंद्र काला के करियर का अहम पड़ाव बनी। इसमें उन्होंने एक टैक्सी ड्राइवर का किरदार निभाया, जो लंबी दूरी की यात्रा के दौरान पुराने फिल्मी गाने गाता है। उनका सहज व्यवहार और संवाद दर्शकों को खूब पसंद आया।इस भूमिका की खास बात यह थी कि उन्होंने सिर्फ एक टैक्सी ड्राइवर की भूमिका नहीं निभाई। उनके किरदार में लंबी ड्राइव की थकान, पुराने गानों के प्रति लगाव, यात्रियों के साथ सहज व्यवहार और अपनी ही दुनिया में मग्न रहने की आदत दिखाई दी। कुछ ही दृश्यों में उन्होंने उस किरदार की पूरी पृष्ठभूमि महसूस करा दी।2008 में मिथ्या में उन्होंने एक छोटे स्तर के भ्रष्ट पुलिस अधिकारी की भूमिका निभाई। यहां उनका अंदाज़ जब वी मेट से बिल्कुल अलग था और विनय पाठक के साथ उनकी जोड़ी ने फिल्म के हास्यपूर्ण हिस्से को खास रंग दिया।

पान सिंह तोमर’ में कुछ मिनटों का यादगार पत्रकार

2012 की पान सिंह तोमर में बृजेंद्र काला ने एक स्थानीय पत्रकार की भूमिका निभाई। किरदार छोटा था, लेकिन उसका असर बड़ा था। वह पान सिंह से मिलने जाता है और उसके डाकू बनने की वजह जानने की कोशिश करता है।इस भूमिका में उनकी आवाज़, घबराहट, हकलाहट, शारीरिक भाषा और सामने वाले को खुश रखने की कोशिश एक साथ दिखाई देती है। उनके सवाल कहानी को आगे बढ़ाते हैं, जबकि उनकी असुरक्षा दृश्य को वास्तविक बनाती है।

यही बृजेंद्र काला की खास कला है—वे छोटे किरदार को कहानी के लिए जरूरी बना देते हैं।

छोटे किरदार को पूरी तरह समझना

बृजेंद्र काला की अभिनय शैली का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है किरदार के पीछे की दुनिया को समझना। वे केवल संवाद याद करके कैमरे के सामने नहीं आते। वे यह समझने की कोशिश करते हैं कि किरदार कहां से आया है, उसकी आर्थिक स्थिति क्या है, उसका परिवार कैसा है और उसकी भाषा और व्यवहार ऐसा क्यों है।उनकी आवाज़ भी हर किरदार के साथ बदलती है। जब वी मेट के टैक्सी ड्राइवर की आवाज़ और पान सिंह तोमर के पत्रकार की आवाज़ में स्पष्ट अंतर दिखाई देता है। इसी तरह चाल, बैठने का तरीका, हाथों की गतिविधियां और शरीर का तनाव भी किरदार के अनुसार बदलता है।उनके लिए संवाद केवल शब्द नहीं हैं। वे संवाद के पीछे छिपी मानसिकता को भी निभाते हैं। यही वजह है कि उनके किरदारों में हास्य स्वाभाविक लगता है और गंभीरता भी बनावटी नहीं लगती।

पीके’ से ‘गुलाबो सिताबो’ तक अलग-अलग रंग

राजकुमार हिरानी की पीके में उन्होंने मंदिर के बाहर मूर्तियां बेचने वाले व्यक्ति की भूमिका निभाई। कुछ ही समय में उन्होंने उसके भीतर ग्राहकों को आकर्षित करने की चालाकी, व्यवसाय को लेकर चिंता और पीके की अजीब हरकतों पर हैरानी जैसी भावनाएं दिखा दीं।राजत कपूर की अंखों देखी में शिब्बू बाबू का किरदार उनकी एक अलग परत सामने लाता है। बेरोजगारी, दूसरों के काम में दखल देने की आदत और खुद को महत्वपूर्ण साबित करने की कोशिश—इन सबको उन्होंने हास्य और चिड़चिड़ेपन के साथ पेश किया।जॉली एलएलबी में वकील और रुस्तम में कांस्टेबल जैसे किरदारों में भी उन्होंने गंभीरता और हल्के हास्य का संतुलन बनाए रखा।वहीं एम.एस. धोनी: द अनटोल्ड स्टोरी में सीमित स्क्रीन-टाइम के बावजूद कमेंटेटर की भूमिका में उन्होंने उत्साह और उम्मीद को प्रभावी ढंग से सामने रखा।

गुलाबो सिताबो’ में किरदार के भीतर की परतें

गुलाबो सिताबो में उनका लखनऊ के वकील का किरदार भी उनकी इसी शैली का उदाहरण है। वह व्यवस्था का हिस्सा है और अपने फायदे, डर और नैतिक समझौतों के बीच काम करता है। बृजेंद्र काला ने उसे सिर्फ खलनायक या पीड़ित के रूप में पेश नहीं किया, बल्कि एक सामान्य इंसान की तरह दिखाया।फिल्म से जुड़ा एक दिलचस्प प्रसंग यह है कि अमिताभ बच्चन ने उन्हें एक दृश्य को अपने अंदाज़ में दोबारा करने के लिए कहा था। यह उनके अभिनय की स्वाभाविकता और अलग पहचान को दर्शाने वाला क्षण था।

संगीत भी है उनकी अभिनय भाषा का हिस्सा

बृजेंद्र काला को संगीत का शौक है और वे कई किरदारों में इसका इस्तेमाल करते दिखाई देते हैं। जब वी मेट का टैक्सी ड्राइवर, शेरनी का कराओके गाने वाला मिस्टर बंसल और पागलपंती में गाते हुए नजर आने वाला किरदार उनके इस अंदाज़ को दिखाते हैं।उनके अभिनय की खूबी यह है कि ये चीजें ऊपर से जोड़ी हुई नहीं लगतीं। उनके जीवन में देखे गए छोटे-छोटे अनुभव भी किरदार का हिस्सा बन जाते हैं। जब वी मेट के टैक्सी ड्राइवर के व्यवहार में उन्होंने अपने एक दोस्त की प्रार्थना करने की आदत से प्रेरित एक वास्तविक अनुभव भी इस्तेमाल किया था।

आलू’ जैसा हर कहानी में फिट होना

बृजेंद्र काला ने चरित्र कलाकारों की तुलना आलू से की है। जैसे आलू अलग-अलग सब्जियों में आसानी से फिट हो जाता है, वैसे ही चरित्र अभिनेता कॉमेडी, रोमांस, थ्रिलर या गंभीर ड्रामा—किसी भी तरह की कहानी का हिस्सा बन सकता है।उनका करियर इस बात का उदाहरण भी है। पुलिस अधिकारी से लेकर टैक्सी ड्राइवर, पत्रकार, वकील और दूसरे आम किरदारों तक, वे किसी एक तरह की छवि में बंधे नहीं रहे।

जब अभिनेता पीछे और किरदार आगे दिखाई देता है

बृजेंद्र काला के अभिनय की शायद सबसे बड़ी खूबी यही है कि उनके किरदारों में अभिनेता पीछे और चरित्र आगे दिखाई देता है। दर्शक यह नहीं सोचता कि वह बृजेंद्र काला को अभिनय करते देख रहा है। उसे लगता है कि स्क्रीन पर वास्तव में वही व्यक्ति मौजूद है।इसके पीछे किरदार की तैयारी, अहं से दूरी, संवाद से आगे जाकर मौन और शारीरिक भाषा का इस्तेमाल और किरदार को उसकी कमजोरियों के साथ स्वीकार करना जैसी खूबियां हैं।यही वजह है कि उनके कई किरदार फिल्म खत्म होने के बाद भी याद रहते हैं। कुछ मिनटों का स्क्रीन-टाइम अगर सही अभिनय से भरा हो, तो वह पूरी फिल्म की याद में अपनी जगह बना सकता है।बृजेंद्र काला का सफर इसी बात की मिसाल है कि अभिनेता बड़ा सिर्फ लंबे रोल से नहीं होता। कभी-कभी कुछ मिनट ही काफी होते हैं—अगर उन मिनटों में किरदार पूरी सच्चाई से जिया गया हो।

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