August 28, 2026 12:30 pm

भारतीय सिनेमा में नृत्य का सफर: मूक फिल्मों के हाव-भाव से ग्लोबल ‘बॉलीवुड डांस’ बनने तक की पूरी कहानी

भारतीय सिनेमा में नृत्य के इतिहास को दर्शाती शास्त्रीय और आधुनिक डांस प्रस्तुति

भारतीय सिनेमा की सबसे बड़ी पहचान उसके गीत और नृत्य हैं। आज दुनिया के किसी भी कोने में बॉलीवुड का नाम आते ही रंग-बिरंगे गाने और शानदार डांस याद आ जाते हैं। लेकिन भारतीय फिल्मों में नृत्य हमेशा से ऐसा नहीं था। मूक फिल्मों के दौर में केवल हाव-भाव से भावनाएं व्यक्त करने की मजबूरी थी, जबकि आज बॉलीवुड डांस एक वैश्विक पहचान बन चुका है। आइए जानते हैं कि भारतीय सिनेमा में नृत्य की शुरुआत कैसे हुई और समय के साथ यह किस तरह विकसित होता गया।

सिनेमा से पहले की विरासत: लोक रंगमंच और शास्त्रीय परंपरा

भारतीय फिल्मों में नृत्य की जड़ें सदियों पुरानी सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ी हैं। सिनेमा के आने से पहले भारत में मनोरंजन का प्रमुख माध्यम लोक रंगमंच था। देश के अलग-अलग हिस्सों में नौटंकी, पारसी थिएटर, तमाशा, रामलीला और यक्षगान जैसे मंचीय प्रदर्शन बेहद लोकप्रिय थे। इन प्रस्तुतियों में संवाद, संगीत और नृत्य एक-दूसरे के पूरक होते थे। यही शैली आगे चलकर भारतीय फिल्मों का आधार बनी।साल 1913 में दादासाहेब फाल्के की राजा हरिश्चंद्र के साथ भारतीय सिनेमा की शुरुआत हुई। यह एक मूक फिल्म थी, इसलिए कलाकारों के पास संवाद बोलने का विकल्प नहीं था। वे केवल चेहरे के हाव-भाव, हाथों की मुद्राओं और शारीरिक अभिव्यक्तियों के माध्यम से भावनाएं दर्शाते थे। इन अभिव्यक्तियों पर भारतीय शास्त्रीय नृत्यों का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता था।

बोलती फिल्मों के साथ शुरू हुआ गीत और नृत्य का नया दौर

साल 1931 में भारत की पहली बोलती फिल्म आलम आरा रिलीज हुई और यहीं से भारतीय फिल्मों में गीत-संगीत और नृत्य की औपचारिक शुरुआत हुई। फिल्म की सफलता ने यह साबित कर दिया कि भारतीय दर्शक संगीत और नृत्य को फिल्मों का अभिन्न हिस्सा मानते हैं।इस दौर में फिल्मों के नृत्य मुख्य रूप से कथक, भरतनाट्यम और अन्य शास्त्रीय शैलियों से प्रेरित थे। फिल्मों में राजदरबार, नवाबों की महफिलें और सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दिखाने के लिए मुजरा भी महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया। उस समय अज़ूरी (Azurie) और शहज़ादी बेगम जैसी कलाकारों ने शुरुआती फिल्मी नृत्य को लोकप्रिय बनाने में अहम भूमिका निभाई।

तकनीकी बदलाव ने बदली फिल्मी नृत्य की प्रस्तुति

1940 के दशक तक भारतीय सिनेमा की तकनीक में तेजी से बदलाव आने लगे। सबसे बड़ा परिवर्तन पार्श्व गायन (Playback Singing) के रूप में सामने आया। अब कलाकारों को कैमरे के सामने स्वयं गाना नहीं पड़ता था। गीत पहले रिकॉर्ड किए जाते और कलाकार केवल उन पर अभिनय व नृत्य करते थे। इससे नृत्य अधिक स्वाभाविक और आकर्षक बन गया।इसी दौर में महान नृत्य गुरु उदय शंकर ने 1948 में फिल्म कल्पना बनाई, जिसे भारतीय सिनेमा की पहली पूर्ण डांस ड्रामा फिल्म माना जाता है। इस फिल्म ने यह दिखाया कि मंच पर प्रस्तुत होने वाला नृत्य और कैमरे के लिए तैयार किया गया नृत्य अलग-अलग विधाएं हैं। कैमरे के एंगल, मूवमेंट और संपादन के अनुसार कोरियोग्राफी तैयार की गई, जिसने आगे की फिल्मों के लिए नई दिशा तय की।इसी वर्ष रिलीज हुई एसएस वासन की फिल्म चंद्रलेखा‘ (1948) का प्रसिद्ध ड्रम डांस भारतीय फिल्म इतिहास की सबसे भव्य नृत्य प्रस्तुतियों में गिना जाता है। विशाल ड्रमों पर फिल्माए गए इस समूह नृत्य ने बड़े पैमाने पर ग्रुप डांस की परंपरा को स्थापित किया।

स्वर्ण युग: जब फिल्मी नृत्य ने बनाई अपनी अलग पहचान

1950 और 1960 का दशक भारतीय सिनेमा का स्वर्ण युग माना जाता है। इसी दौर में फिल्मी नृत्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं रहा, बल्कि फिल्मों की पहचान बन गया।इस समय अभिनेता भगवान दादा (मास्टर भगवान) ने फिल्म अलबेला‘ (1951) के गीत शोला जो भड़के के माध्यम से एक सरल और लयबद्ध नृत्य शैली प्रस्तुत की। उनकी सहज शैली ने यह संदेश दिया कि नृत्य केवल प्रशिक्षित कलाकारों तक सीमित नहीं है, बल्कि आम लोग भी इसे अपना सकते हैं। बाद में अमिताभ बच्चन और गोविंदा जैसे कलाकारों के डांस में भी इस शैली की झलक देखने को मिली।इसी दौर में कुक्कू मोरे और विशेष रूप से हेलेन ने भारतीय फिल्मों में पश्चिमी शैली के कैबरे और क्लब डांस को लोकप्रिय बनाया। धीरे-धीरे लगभग हर व्यावसायिक फिल्म में एक कैबरे या विशेष डांस प्रस्तुति शामिल की जाने लगी।शास्त्रीय नृत्य की भव्यता का सबसे शानदार उदाहरण के. आसिफ की फिल्म मुगलआजम‘ (1960) में देखने को मिला। मधुबाला पर फिल्माया गया गीत प्यार किया तो डरना क्या कथक, भव्य सेट और शानदार सिनेमैटोग्राफी का अद्भुत संगम माना जाता है। वहीं वैजयंतीमाला और वहीदा रहमान जैसी अभिनेत्रियों ने भी अपने शास्त्रीय नृत्य कौशल से भारतीय फिल्मों को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।

डिस्को युग और कोरियोग्राफर्स का बढ़ता महत्व

1970 और 1980 के दशक में पश्चिमी संगीत और पॉप संस्कृति का प्रभाव भारतीय फिल्मों पर स्पष्ट दिखाई देने लगा। इसका सबसे बड़ा उदाहरण मिथुन चक्रवर्ती की फिल्म डिस्को डांसर‘ (1982) रही। इस फिल्म ने देशभर में डिस्को और स्ट्रीट डांस की नई लहर पैदा कर दी। युवाओं के बीच पश्चिमी शैली के नृत्य तेजी से लोकप्रिय होने लगे।इसी समय फिल्म उद्योग में कोरियोग्राफर्स को भी नई पहचान मिलने लगी। सरोज खान ने श्रीदेवी और माधुरी दीक्षित जैसी अभिनेत्रियों के साथ मिलकर ऐसे यादगार नृत्य तैयार किए, जिन्होंने फिल्मों की लोकप्रियता को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। हवा हवाई और एक दो तीन जैसे गीत आज भी भारतीय फिल्म इतिहास के सबसे चर्चित डांस नंबरों में गिने जाते हैं।

आधुनिक दौर: जब बॉलीवुड डांस बना वैश्विक पहचान

1990 के दशक के बाद भारतीय सिनेमा ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई। इसके साथ ही फिल्मी नृत्य में भी बड़ा बदलाव आया। भारतीय शैलियों के साथ हिपहॉप, सालसा, जैज, कंटेंपरेरी, लॉकिंग और पॉपिंग जैसे अंतरराष्ट्रीय डांस फॉर्म्स का मिश्रण शुरू हुआ।प्रभु देवा, श्यामक डावर, गणेश आचार्य और रेमो डिसूजा जैसे कोरियोग्राफर्स ने भारतीय फिल्मों के नृत्य को आधुनिक और वैश्विक रूप दिया। इस दौर में फिल्मों के प्रचार के लिए विशेष डांस नंबर भी महत्वपूर्ण बन गए। वहीं ‘ABCD (Any Body Can Dance)’ जैसी फिल्मों ने नृत्य और डांसर्स के संघर्ष को मुख्य विषय बनाकर यह साबित किया कि डांस अब केवल फिल्मों का हिस्सा नहीं, बल्कि अपने आप में एक स्वतंत्र कला और उद्योग बन चुका है।

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