September 5, 2026 4:34 pm

रूस-यूक्रेन युद्ध का भारत और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ा?

रूस-यूक्रेन युद्ध का भारत और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर

रूस-यूक्रेन युद्ध ने सिर्फ यूरोप की राजनीति और सुरक्षा व्यवस्था को प्रभावित नहीं किया, बल्कि इसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर भी देखने को मिला। ऊर्जा बाजार से लेकर खाद्य सुरक्षा, महंगाई, व्यापार और सप्लाई चेन तक कई क्षेत्रों में इस युद्ध ने अनिश्चितता बढ़ाई। भारत भी इससे पूरी तरह अछूता नहीं रहा। युद्ध शुरू होने के बाद कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस, गेहूं, खाद्य तेल और उर्वरकों जैसी महत्वपूर्ण वस्तुओं की कीमतों तथा उपलब्धता को लेकर दबाव बढ़ा। इसका सीधा और अप्रत्यक्ष असर दुनिया के साथ-साथ भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ा।

कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ा बड़ा असर

रूस दुनिया के प्रमुख ऊर्जा उत्पादक देशों में शामिल है। युद्ध के बाद रूस पर लगाए गए पश्चिमी प्रतिबंधों और वैश्विक बाजार में पैदा हुई अनिश्चितता के कारण कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिला। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़ी मात्रा में कच्चे तेल का आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने पर भारत का इंपोर्ट बिल बढ़ने का दबाव रहता है। इससे देश के व्यापार संतुलन और चालू खाता घाटे पर भी असर पड़ सकता है। हालांकि, युद्ध के बाद भारत ने रूस से उपलब्ध कच्चे तेल की खरीद बढ़ाकर अपनी ऊर्जा जरूरतों और लागत को संतुलित करने की कोशिश की। इससे वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच भारत को कुछ राहत भी मिली।

महंगाई बढ़ने का दबाव

युद्ध का एक बड़ा आर्थिक असर महंगाई के रूप में सामने आया। तेल महंगा होने का असर केवल पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं रहता। परिवहन लागत बढ़ने से सामान को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाना महंगा हो जाता है। इसका असर उत्पादन और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर भी पड़ सकता है। यानी कच्चे तेल की कीमतों में बदलाव का प्रभाव अर्थव्यवस्था के कई हिस्सों तक पहुंचता है। भारत में भी ऊर्जा और खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर दबाव बढ़ने से महंगाई को लेकर चिंता बनी रही।

खाद्य सुरक्षा के लिए बढ़ी चुनौती

रूस और यूक्रेन दोनों ही वैश्विक कृषि बाजार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। दोनों देशों से गेहूं और अन्य कृषि उत्पादों का बड़ा अंतरराष्ट्रीय व्यापार होता है। युद्ध के कारण उत्पादन, परिवहन और निर्यात व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका बढ़ी। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर दबाव आया और कई देशों के लिए खाद्य सुरक्षा एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन गई। खाद्य तेल के बाजार पर भी इसका असर देखा गया। अंतरराष्ट्रीय सप्लाई में रुकावट आने पर आयात पर निर्भर देशों में कीमतों को लेकर दबाव बढ़ सकता है।

उर्वरकों और उद्योगों पर असर

रूस वैश्विक उर्वरक बाजार में भी महत्वपूर्ण भूमिका रखता है। युद्ध और प्रतिबंधों के कारण उर्वरकों तथा उनसे जुड़े कच्चे माल की आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता बढ़ी। भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए उर्वरकों की उपलब्धता महत्वपूर्ण है। यदि उर्वरक या कच्चा माल महंगा होता है तो इसका असर खेती की लागत पर पड़ सकता है और लंबे समय में खाद्य कीमतों पर भी दबाव बन सकता है। इसके अलावा, कई उद्योगों को कच्चे माल और सप्लाई चेन से जुड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा।

वैश्विक सप्लाई चेन हुई प्रभावित

युद्ध ने दुनिया की पहले से मौजूद सप्लाई चेन की चुनौतियों को और बढ़ाया। परिवहन मार्गों में व्यवधान, व्यापार प्रतिबंध और ऊर्जा की बढ़ती लागत ने कंपनियों के लिए सामान की खरीद और आपूर्ति को मुश्किल बनाया। इसका असर उन देशों और कंपनियों पर ज्यादा पड़ा जो कुछ खास कच्चे माल या ऊर्जा स्रोतों के लिए दूसरे देशों पर निर्भर थे।

वित्तीय बाजारों में बढ़ी अनिश्चितता

रूस पर लगाए गए आर्थिक और वित्तीय प्रतिबंधों ने वैश्विक वित्तीय बाजारों में भी अनिश्चितता बढ़ाई। निवेशकों के लिए युद्ध की अवधि, ऊर्जा कीमतों और वैश्विक आर्थिक विकास को लेकर अनुमान लगाना मुश्किल हुआ। ऐसे माहौल में शेयर बाजार, करेंसी और कमोडिटी बाजारों में उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है। इसका असर कारोबार और निवेश के फैसलों पर भी पड़ता है।

भारत पर कुल मिलाकर क्या असर पड़ा?

रूस-यूक्रेन युद्ध का भारत पर असर मिश्रित रहा। एक तरफ महंगे तेल, खाद्य पदार्थों, उर्वरकों और सप्लाई चेन की चुनौतियों ने अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ाया। दूसरी तरफ रूस से अपेक्षाकृत अनुकूल कीमतों पर कच्चे तेल की खरीद ने भारत की ऊर्जा जरूरतों को संभालने में भूमिका निभाई। इस युद्ध ने भारत के लिए एक महत्वपूर्ण सबक भी सामने रखा—ऊर्जा, खाद्य और कच्चे माल के लिए किसी एक क्षेत्र या देश पर अत्यधिक निर्भरता आर्थिक जोखिम बढ़ा सकती है।

रूस-यूक्रेन युद्ध का असर केवल दो देशों तक सीमित नहीं रहा। इसने तेल, गैस, खाद्य पदार्थ, उर्वरक, सप्लाई चेन और वित्तीय बाजारों के जरिए वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया। भारत ने कई चुनौतियों के बीच अपनी ऊर्जा जरूरतों और व्यापारिक हितों को संतुलित करने की कोशिश की। आने वाले समय में युद्ध और वैश्विक प्रतिबंधों से जुड़ी परिस्थितियां बदलने पर कच्चे तेल की कीमतें, महंगाई और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर इसका प्रभाव भी बदल सकता है।

——Daily Insights

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