भारत में राशन व्यवस्था का इतिहास देश की खाद्य सुरक्षा और गरीब परिवारों को सस्ती दरों पर अनाज उपलब्ध कराने के प्रयासों से जुड़ा है। आज सार्वजनिक वितरण प्रणाली (Public Distribution System यानी PDS) के माध्यम से पात्र परिवारों तक खाद्यान्न पहुंचाया जाता है। लेकिन इस व्यवस्था की शुरुआत आजादी से पहले द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान हुई थी। समय के साथ राशन प्रणाली में कई बदलाव हुए और यह खाद्य संकट से निपटने के उपाय से आगे बढ़कर देश की महत्वपूर्ण सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था बन गई।
भारत में राशन व्यवस्था की शुरुआत कब हुई?
भारत में राशन व्यवस्था की शुरुआत वर्ष 1939 में बॉम्बे, जिसे आज मुंबई कहा जाता है, में हुई थी। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान खाद्यान्न की उपलब्धता और कीमतों से जुड़ी समस्याओं के कारण ब्रिटिश सरकार ने राशनिंग व्यवस्था शुरू की। इसका उद्देश्य सीमित खाद्यान्न का वितरण व्यवस्थित करना और लोगों तक जरूरी खाद्य सामग्री पहुंचाना था।शुरुआत में यह व्यवस्था मुख्य रूप से शहरी क्षेत्रों तक सीमित थी। धीरे-धीरे इसका विस्तार दूसरे शहरों और कस्बों में भी किया गया। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, 1943 के अंत तक 13 शहरों में राशनिंग लागू थी, जबकि 1946 तक यह व्यवस्था 771 शहरों और कस्बों तक पहुंच गई थी।वर्ष 1942 में खाद्य विभाग की स्थापना भी खाद्यान्न की खरीद और वितरण को व्यवस्थित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम थी। इस दौर के अनुभवों ने आगे चलकर भारत की सार्वजनिक वितरण प्रणाली के विकास की नींव रखी।
आजादी के बाद राशन व्यवस्था में क्या बदलाव हुए?
1947 में स्वतंत्रता मिलने के बाद भारत को खाद्यान्न की उपलब्धता, महंगाई और बढ़ती आबादी जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। ऐसे समय में राशन व्यवस्था की भूमिका महत्वपूर्ण बनी रही। वर्ष 1950 के आसपास खाद्य आपूर्ति और कीमतों से जुड़ी समस्याओं के कारण राशनिंग व्यवस्था को फिर से मजबूत करने की जरूरत महसूस हुई।शुरुआती वर्षों में सार्वजनिक वितरण प्रणाली काफी हद तक आयातित अनाज पर निर्भर थी। इसका प्रमुख उद्देश्य जरूरतमंद शहरी आबादी तक अनाज पहुंचाना और उचित मूल्य पर खाद्यान्न उपलब्ध कराना था।समय के साथ PDS का स्वरूप भी बदला। यह केवल राशन बांटने की व्यवस्था नहीं रही, बल्कि खाद्य सुरक्षा और सामाजिक कल्याण से जुड़ा एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम बन गई। सरकार ने धीरे-धीरे इसके विस्तार और खाद्यान्न की उपलब्धता सुनिश्चित करने पर ध्यान दिया।
1965 में FCI की स्थापना से मजबूत हुई खाद्य सुरक्षा
भारत में 1960 के दशक के दौरान खाद्यान्न की कमी और खाद्य संकट ने सरकार को घरेलू उत्पादन, खरीद और भंडारण व्यवस्था मजबूत करने के लिए प्रेरित किया। इसी संदर्भ में वर्ष 1965 में भारतीय खाद्य निगम (Food Corporation of India यानी FCI) की स्थापना हुई।इसी वर्ष कृषि मूल्य आयोग की भी स्थापना की गई, जिसे बाद में कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (CACP) के नाम से जाना गया। इन संस्थाओं ने कृषि उत्पादन से जुड़े मूल्य निर्धारण, खाद्यान्न खरीद और खाद्य सुरक्षा की नीतियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।हरित क्रांति के बाद गेहूं और चावल के उत्पादन में वृद्धि हुई। इससे सरकारी खरीद और खाद्यान्न भंडारण को मजबूत करने में मदद मिली। घरेलू उत्पादन और बफर स्टॉक की उपलब्धता ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिए खाद्यान्न जुटाने की क्षमता बढ़ाई।
ग्रामीण क्षेत्रों तक कैसे पहुंची सार्वजनिक वितरण प्रणाली?
शुरुआती दौर में राशन व्यवस्था मुख्य रूप से शहरी क्षेत्रों पर केंद्रित थी। लेकिन खाद्य सुरक्षा की जरूरत को देखते हुए 1970 और 1980 के दशकों में इसका विस्तार ग्रामीण इलाकों तक किया गया।सरकारी खरीद और खाद्यान्न भंडारण में सुधार के साथ राशन दुकानों का नेटवर्क भी बढ़ा। इससे अधिक परिवारों तक उचित मूल्य पर खाद्यान्न पहुंचाने की व्यवस्था विकसित हुई।सार्वजनिक वितरण प्रणाली के विस्तार का उद्देश्य केवल खाद्यान्न उपलब्ध कराना नहीं था, बल्कि गरीब परिवारों पर भोजन के खर्च का बोझ कम करना भी था। हालांकि, इस व्यवस्था की प्रभावशीलता खाद्यान्न की उपलब्धता, वितरण व्यवस्था और पात्र परिवारों तक लाभ पहुंचने पर निर्भर करती रही।
1992 में RPDS और 1997 में TPDS की शुरुआत
आर्थिक सुधारों के दौर में सार्वजनिक वितरण प्रणाली के खर्च, पहुंच और लाभार्थियों की पहचान को लेकर नीतिगत बदलाव किए गए।जून 1992 में पुनर्गठित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (Revamped Public Distribution System यानी RPDS) शुरू की गई। इसका उद्देश्य दूरस्थ, पहाड़ी और दुर्गम क्षेत्रों में राशन व्यवस्था को मजबूत करना था। इस कार्यक्रम को देश के 1,775 ब्लॉकों में लागू किया गया था।इसके बाद जून 1997 में लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (Targeted Public Distribution System यानी TPDS) शुरू की गई। इस व्यवस्था के तहत लाभार्थियों को उनकी आर्थिक स्थिति के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में बांटा गया। गरीबी रेखा से नीचे (BPL) और गरीबी रेखा से ऊपर (APL) परिवारों की श्रेणियां इसी व्यवस्था का हिस्सा थीं।वर्ष 2000 में अंत्योदय अन्न योजना (AAY) शुरू की गई। इसका उद्देश्य समाज के सबसे गरीब परिवारों को खाद्य सुरक्षा उपलब्ध कराना था। इन बदलावों ने राशन व्यवस्था को अधिक लक्षित बनाने की कोशिश की।
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013 का महत्व
वर्ष 2013 में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (National Food Security Act यानी NFSA) पारित किया गया। इस कानून ने पात्र परिवारों के लिए खाद्यान्न प्राप्त करने के अधिकार को कानूनी आधार दिया और सार्वजनिक वितरण प्रणाली को एक व्यापक खाद्य सुरक्षा ढांचे से जोड़ा।NFSA के तहत ग्रामीण आबादी के 75 प्रतिशत और शहरी आबादी के 50 प्रतिशत तक को शामिल करने का प्रावधान किया गया। पात्र प्राथमिकता परिवारों के लिए सामान्य व्यवस्था में प्रति व्यक्ति प्रति माह 5 किलोग्राम खाद्यान्न का प्रावधान है, जबकि अंत्योदय अन्न योजना के पात्र परिवारों के लिए प्रति परिवार प्रति माह 35 किलोग्राम खाद्यान्न का प्रावधान है।इस कानून का उद्देश्य कमजोर आर्थिक स्थिति वाले परिवारों को खाद्यान्न की उपलब्धता सुनिश्चित करना और भूख तथा खाद्य असुरक्षा से निपटने में मदद करना है। इसके कार्यान्वयन के साथ राशन व्यवस्था की पहुंच और जवाबदेही को बेहतर बनाने पर भी जोर दिया गया।
डिजिटल राशन व्यवस्था और PDS का भविष्य
समय के साथ सार्वजनिक वितरण प्रणाली में तकनीक का इस्तेमाल बढ़ा है। राशन कार्डों का डिजिटलीकरण, ऑनलाइन रिकॉर्ड और इलेक्ट्रॉनिक पॉइंट ऑफ सेल (ePoS) मशीनों जैसी व्यवस्थाओं ने राशन वितरण की निगरानी को बेहतर बनाने में मदद की है।वन नेशन वन राशन कार्ड जैसी पहल से पात्र लाभार्थियों को दूसरे राज्यों में भी राशन प्राप्त करने की सुविधा मिली है। इससे विशेष रूप से उन श्रमिकों और परिवारों को मदद मिल सकती है, जो रोजगार के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते हैं।डिजिटल व्यवस्था के बावजूद यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि पात्र परिवारों को बिना परेशानी राशन मिले। तकनीकी समस्याएं, नेटवर्क की कमी और रिकॉर्ड में त्रुटियां लाभार्थियों के लिए चुनौती बन सकती हैं। इसलिए तकनीक के साथ प्रभावी शिकायत निवारण और पारदर्शी वितरण व्यवस्था भी आवश्यक है।भारत में राशन व्यवस्था का सफर 1939 की युद्धकालीन राशनिंग से शुरू होकर सार्वजनिक वितरण प्रणाली, लक्षित राशन व्यवस्था और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम तक पहुंचा है। आज यह लाखों परिवारों की खाद्य सुरक्षा से जुड़ी महत्वपूर्ण व्यवस्था है। इसके प्रभावी संचालन के लिए खाद्यान्न की उपलब्धता, सही लाभार्थियों की पहचान और पारदर्शी वितरण पर लगातार ध्यान देना जरूरी है
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