October 10, 2026 1:21 pm

नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी: छोटे किरदारों से बड़े मुकाम तक का यादगार अभिनय सफर

नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी का अभिनय सफर

नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी हिंदी सिनेमा के उन अभिनेताओं में हैं, जिन्होंने छोटे और सीमित किरदारों से शुरुआत करके अपने अभिनय के दम पर एक अलग पहचान बनाई। उनकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि वे किसी किरदार को केवल निभाते नहीं, बल्कि उसकी मानसिकता, व्यवहार और भावनाओं को समझकर उसे पर्दे पर जीवंत करने की कोशिश करते हैं। फैज़ल खान से लेकर शेख, चांद नवाब और सादत हसन मंटो तक, उनके किरदारों में यह बदलाव साफ दिखाई देता है। Pasted textउत्तर प्रदेश के बुढ़ाना गांव से शुरू हुई नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी की यात्रा खेती-किसानी के माहौल से निकलकर रसायन विज्ञान की नौकरी, थिएटर, संघर्ष, NSD और फिर हिंदी सिनेमा तक पहुंची। लंबे संघर्ष के बाद उन्होंने अपनी अभिनय शैली से ऐसी जगह बनाई, जहां उनकी मौजूदगी अक्सर फिल्म के पूरे प्रभाव को बदल देती है।

बुढ़ाना से शुरू हुआ अभिनय का सपना

नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी का जन्म 19 मई 1974 को उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के बुढ़ाना गांव में हुआ। उनका परिवार खेती से जुड़ा था और बचपन में ही उन्हें अभिनय तथा प्रदर्शन कला में रुचि होने लगी थी। स्कूल में वे कविता पाठ और ड्रामा प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेते थे। Pasted textकॉलेज के दिनों में उन्होंने गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार से रसायन विज्ञान में स्नातक की पढ़ाई की। पढ़ाई के बाद उन्होंने वडोदरा की एक पेट्रोकेमिकल फैक्ट्री में मुख्य रसायनज्ञ के तौर पर भी काम किया। लेकिन नौकरी उन्हें संतुष्ट नहीं कर पाई। यही असंतोष उन्हें धीरे-धीरे थिएटर की तरफ ले गया।

नौकरी छोड़कर थिएटर की दुनिया में कदम

रसायन विज्ञान की नौकरी से ऊबने के बाद नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी ने वडोदरा की एम.एस. यूनिवर्सिटी के ड्रामा विभाग में थिएटर शुरू किया। उन्होंने गुजराती नाटकों में काम किया और इसके बाद भारतेन्दु नाट्य अकादमी, लखनऊ से भी जुड़े। आगे चलकर उनका लक्ष्य राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय यानी NSD में दाखिला लेना था। Pasted textNSD में प्रवेश की कोशिश असफल रही, लेकिन उन्होंने दिल्ली छोड़ने के बजाय संघर्ष जारी रखा। इस दौरान उन्होंने वॉचमैन के रूप में काम किया और बेहद सीमित आमदनी में अपना जीवन चलाया। आर्थिक मुश्किलों के बावजूद उन्होंने थिएटर नहीं छोड़ा।

वॉचमैन की नौकरी से NSD तक

नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी रात में वॉचमैन की नौकरी करते और सुबह थिएटर रिहर्सल में हिस्सा लेते थे। उन्होंने स्ट्रीट थिएटर के हजारों शो किए और छोटे से छोटे किरदार को भी स्वीकार किया, क्योंकि उनके लिए उस समय सबसे जरूरी था लगातार काम करना और अभिनय सीखते रहना। Pasted textआखिरकार उन्होंने NSD की प्रवेश परीक्षा पास की और 1996 में वहां से स्नातक किया। उनके अनुसार NSD ने उनकी अभिनय शैली और सोचने के तरीके को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हालांकि NSD से निकलने के बाद मुंबई में भी उन्हें तुरंत काम नहीं मिला और संघर्ष का एक नया दौर शुरू हुआ।

‘सरफरोश’ में छोटा किरदार, लेकिन बड़ा असर

1999 में जॉन मैथ्यू मथन की फिल्म सरफरोश में नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी ने एक आतंकवादी की छोटी भूमिका निभाई। यह किरदार सिर्फ एक सीन तक सीमित था, लेकिन उनके लिए यह महत्वपूर्ण साबित हुआ। Pasted textउन्होंने खुद माना कि सरफरोश में लगभग 40 सेकंड का दृश्य भी उनके अभिनय सफर में महत्वपूर्ण साबित हुआ और इसी अनुभव के जरिए उनकी मुलाकात अनुराग कश्यप से हुई। यह आगे आने वाले उनके करियर के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ बना।

‘ब्लैक फ्राइडे’ से बढ़ा आत्मविश्वास

2004 में अनुराग कश्यप की Black Friday में नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी ने तीन दृश्यों वाली भूमिका निभाई। फिल्म 1993 के बंबई बम विस्फोटों की पृष्ठभूमि पर आधारित थी। फिल्म की रिलीज को लेकर आई मुश्किलों के बावजूद इस प्रोजेक्ट ने अभिनेता के तौर पर नवाज़ुद्दीन का आत्मविश्वास बढ़ाया। Pasted textउनके लिए यह दौर इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि उन्हें लगने लगा था कि लगातार छोटे किरदारों के बावजूद अब एक अभिनेता के तौर पर उनके लिए बेहतर अवसर आने लगे हैं।

‘कहानी’ से मिली नई पहचान

2012 में सुजॉय घोष की फिल्म Kahaani में नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी ने बिद्या बघेल के पति की भूमिका निभाई। फिल्म एक गर्भवती महिला की कहानी थी, जो अपने गायब पति की तलाश में कोलकाता पहुंचती है। Pasted textइस भूमिका में भी उन्होंने सीमित स्क्रीन स्पेस के भीतर किरदार को प्रभावशाली बनाने की कोशिश की। इसी दौर में Kahaani, Gangs of Wasseypur और Talaash जैसी फिल्मों के बाद उनके करियर में महत्वपूर्ण बदलाव आया।

‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ के फैज़ल खान ने बदल दी तस्वीर

2012 में अनुराग कश्यप की Gangs of Wasseypur नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी के करियर की बड़ी फिल्मों में शामिल हुई। इसमें उन्होंने फैज़ल खान का किरदार निभाया, जो अपराध और सत्ता के संघर्ष के बीच अपनी पहचान बनाने वाला व्यक्ति है। Pasted textफैज़ल खान के किरदार ने नवाज़ुद्दीन को व्यापक पहचान दी। स्रोत के अनुसार फिल्म रिलीज होने के कुछ समय के भीतर उन्हें बड़ी संख्या में स्क्रिप्ट मिलने लगीं। हालांकि उन्होंने तुरंत हर प्रस्ताव स्वीकार करने के बजाय कुछ समय लेकर अपने आगे के काम को चुनने का फैसला किया।

‘द लंचबॉक्स’ में दिखा संवेदनशील पक्ष

2013 में रितेश बत्रा की The Lunchbox में नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी ने शेख का किरदार निभाया। यह एक अकेले व्यक्ति की संवेदनशील कहानी थी। यहां उनका अभिनय अपराध या हिंसा से बिल्कुल अलग भावनात्मक और मानवीय धरातल पर दिखाई दिया। Pasted textशेख के किरदार में उनकी सहजता और सूक्ष्म अभिनय ने यह दिखाया कि नवाज़ुद्दीन केवल गैंगस्टर या नकारात्मक भूमिकाओं तक सीमित अभिनेता नहीं हैं।

‘बजरंगी भाईजान’ के चांद नवाब से मुख्यधारा में पहचान

2015 में कबीर खान की Bajrangi Bhaijaan में नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी ने पाकिस्तानी पत्रकार चांद नवाब की भूमिका निभाई। यह किरदार गंभीर कहानी के बीच हास्य और मानवीय संवेदनाओं का संतुलन लेकर आया। Pasted textचांद नवाब का किरदार दर्शकों के बीच काफी लोकप्रिय हुआ और इससे नवाज़ुद्दीन की पहुंच मुख्यधारा के बड़े दर्शक वर्ग तक और मजबूत हुई।

‘मंटो’ में सादत हसन मंटो को किया जीवंत

2018 में नंदिता दास की फिल्म Manto में नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी ने मशहूर लेखक सादत हसन मंटो की भूमिका निभाई। यह उनके लिए एक चुनौतीपूर्ण जीवनीपरक किरदार था, क्योंकि मंटो के व्यक्तित्व को पर्दे पर उतारने के लिए केवल बाहरी हावभाव पर्याप्त नहीं थे। Pasted textनवाज़ुद्दीन ने बताया कि मंटो के बहुत अधिक वीडियो उपलब्ध नहीं थे और मुख्य रूप से तस्वीरों के आधार पर उन्हें किरदार तैयार करना पड़ा। इसलिए उन्होंने अपने भाव और अभिनय शैली के साथ मंटो के व्यक्तित्व के अलग-अलग रंगों को संतुलित करने की कोशिश की। थिएटर आज भी अभिनय की बुनियादनवाज़ुद्दीन सिद्दीकी के लिए थिएटर केवल करियर की शुरुआत नहीं था। वे इसे आज भी एक आध्यात्मिक अनुशासन मानते हैं। उनके अनुसार थिएटर में हर प्रदर्शन के बाद अभिनेता अपने काम में सुधार कर सकता है और दर्शकों की सीधी प्रतिक्रिया से सीख सकता है। Pasted textस्ट्रीट थिएटर के हजारों शो से लेकर NSD की ट्रेनिंग तक का अनुभव उनके फिल्मी अभिनय में भी दिखाई देता है। थिएटर ने उन्हें किरदार की बारीकियों, संवाद और दर्शकों के साथ सीधे जुड़ने की कला समझने में मदद की।

नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी की सबसे बड़ी ताकत है किरदार में उतर जाना

नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी की अभिनय शैली की सबसे खास बात यह है कि वे किरदार को बाहर से दिखाने के बजाय उसके भीतर जाने की कोशिश करते हैं। उनकी भूमिका चाहे गैंगस्टर की हो, पत्रकार की, लेखक की या किसी अकेले व्यक्ति की—वे किरदार की सामाजिक स्थिति, भाषा, व्यवहार और मानसिकता को समझने पर जोर देते हैं। Pasted textउनके करियर को देखें तो एक स्पष्ट बदलाव दिखाई देता है। शुरुआत में छोटे और एक-दो दृश्यों वाले किरदारों से लेकर Gangs of Wasseypur, The Lunchbox, Bajrangi Bhaijaan और Manto जैसी फिल्मों तक उन्होंने लगातार अलग-अलग तरह की भूमिकाएं चुनीं।यही विविधता नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी को एक ऐसे अभिनेता के रूप में स्थापित करती है, जिनकी पहचान सिर्फ किसी एक शैली या किरदार से नहीं होती। उनका अभिनय संघर्ष, थिएटर की तैयारी और किरदार को विश्वसनीय बनाने की कोशिश से विकसित हुआ है। बुढ़ाना से शुरू हुई उनकी यात्रा यह बताती है कि छोटे अवसर भी बड़े करियर की नींव बन सकते हैं, अगर कलाकार लगातार सीखने और काम करने के लिए तैयार रहे।

 ENTERTAINMENT DESK | DAILY INSIGHTS

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