October 2, 2026 4:16 pm

सीमा पाहवा: थिएटर से सिनेमा तक, घरेलू किरदारों को जीवंत बनाने वाली अभिनेत्री

सीमा पाहवा का थिएटर से सिनेमा तक अभिनय सफर

सीमा पाहवा हिंदी सिनेमा और टेलीविजन की उन अभिनेत्रियों में हैं, जिन्होंने घरेलू और आम जिंदगी से जुड़े किरदारों को अपनी सहज अदाकारी से यादगार बनाया। माँ, पत्नी, बहन या परिवार के किसी सदस्य की भूमिका हो, उनके अभिनय में किरदार बनावटी नहीं बल्कि आसपास के वास्तविक जीवन का हिस्सा नजर आते हैं। थिएटर ने उनकी अभिनय शैली को गहराई दी और लंबे अनुभव ने उन्हें अलग-अलग माध्यमों में काम करने का अवसर दिया।

दिल्ली के थिएटर परिवार से शुरू हुआ अभिनय सफर

सीमा पाहवा का जन्म 10 फरवरी 1962 को दिल्ली में एक थिएटर परिवार में हुआ। उनकी माँ सरोज भार्गव थिएटर अभिनेत्री थीं, जबकि उनके पिता व्यवसायी थे। बचपन से ही सीमा का जुड़ाव अभिनय और प्रदर्शन कला से हो गया था। वे अपनी माँ के साथ थिएटर और रेडियो प्ले में हिस्सा लेती थीं।कम उम्र में ही उन्होंने रेडियो और टेलीविजन के लिए काम करना शुरू कर दिया था। 1968 में उन्हें समझौता नाम के शो में भूमिका मिली। उस दौर में टेलीविजन के लाइव प्रसारण में कलाकारों के लिए गलती सुधारने की कोई गुंजाइश नहीं होती थी। इस शुरुआती अनुभव ने उनके अभिनय अनुशासन को मजबूत किया।

रेडियो और टेलीविजन से मिली शुरुआती पहचान

1970 के दशक में सीमा पाहवा ने रेडियो शो ‘अपने अपने बच्चे’ के लिए आवाज दी। स्रोत के अनुसार, उन्होंने लगभग 150 रेडियो प्ले और 70 टेलीविजन कार्यक्रमों में काम किया। इस लंबे अनुभव ने उन्हें अलग-अलग माध्यमों में अभिनय की बारीकियां समझने का अवसर दिया।उस दौर में तकनीकी सुविधाएं आज जैसी नहीं थीं। लाइव टेलीविजन में कलाकारों को लगातार तैयारी और रिहर्सल के साथ प्रदर्शन करना पड़ता था। सीमा पाहवा के अनुसार, उस समय अभिनय में गलती सुधारने की गुंजाइश बेहद सीमित थी।

थिएटर ने गढ़ी अभिनय की शैली

सीमा पाहवा ने दिल्ली के संभव ग्रुप और NSD रेपर्टरी कंपनी के साथ काम किया। उन्होंने बी.एम. व्यास, बी.वी. कारंत, बंसी कौल, भानु भारती और राजिंदर नाथ जैसे निर्देशकों के साथ काम किया।उनका थिएटर अनुभव केवल पारंपरिक मंच तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने स्ट्रीट थिएटर, रामलीला और खुले स्थानों पर होने वाले कार्यक्रमों में भी अभिनय किया। आधे अधूरे, खामोश अदालत जारी है, कैद-ए-हयात और नटसम्राट जैसे नाटकों ने उनके अभिनय अनुभव को और विस्तार दिया।

‘हम लोग’ की बड़की से घर-घर पहचान

1984 से 1986 के बीच दूरदर्शन पर प्रसारित ‘हम लोग’ में सीमा पाहवा ने बड़की की भूमिका निभाई। यह धारावाहिक भारत के शुरुआती और बेहद चर्चित टेलीविजन सोप ओपेरा में शामिल था।बड़की के किरदार ने उन्हें घर-घर पहचान दिलाई। उनके अनुसार, इस भूमिका के बाद लोग उन्हें वास्तविक जीवन में भी बड़की के रूप में पहचानने लगे थे। 156 एपिसोड के इस शो के बाद उन्होंने 1986 में दोबारा थिएटर का रुख किया।

मनोज पाहवा से मुलाकात और शादी

संभव ग्रुप में काम करते हुए सीमा पाहवा की मुलाकात अभिनेता मनोज पाहवा से हुई। दोनों ने कई नाटकों में साथ काम किया और बाद में शादी कर ली। स्रोत के अनुसार, दोनों ने 1988 में विवाह किया।1994 में मुंबई जाने के बाद भी सीमा पाहवा का थिएटर से रिश्ता जारी रहा। उन्होंने नसीरुद्दीन शाह के निर्देशन वाले कथा कोलाज I और कम्बख्त बिल्कुल औरत जैसे मंचीय प्रोजेक्ट्स में काम किया।

‘आंखों देखी’ की अम्मा ने फिल्मों में अलग पहचान बनाई

2013 में राजत कपूर की फिल्म ‘आंखों देखी’ में सीमा पाहवा ने अम्मा, यानी हरिश चंद्र की पत्नी का किरदार निभाया। मध्यमवर्गीय परिवार की कहानी वाली इस फिल्म में उनका अभिनय बेहद स्वाभाविक और घरेलू जीवन के करीब दिखाई दिया।राजत कपूर ने भी उनके किरदार की प्रामाणिकता को रेखांकित किया और बताया कि कई दर्शकों ने अम्मा के किरदार में अपने परिवार की किसी महिला की झलक महसूस की।यहीं से सीमा पाहवा की फिल्मी पहचान को नया विस्तार मिला।

‘दम लगा के हईशा’ में मां का सहज किरदार

2015 में आई ‘दम लगा के हईशा’ में उन्होंने संध्या की माँ की भूमिका निभाई। इस किरदार को उन्होंने आंखों देखी की अम्मा से अलग बताया—जहां अम्मा अधिक दुनियादार थी, वहीं यहां उनकी भूमिका ज्यादा परेशान और भोली मां की थी।यह अंतर दिखाता है कि सीमा पाहवा समान पारिवारिक भूमिकाओं में भी अलग व्यक्तित्व और व्यवहार विकसित करने पर ध्यान देती हैं।

‘बरेली की बर्फी’ और ‘शुभ मंगल सावधान’ से बनी नई पहचान

2017 में सीमा पाहवा ‘बरेली की बर्फी’ और ‘शुभ मंगल सावधान’ जैसी फिल्मों में मां की भूमिकाओं में नजर आईं। इन फिल्मों के बाद उनकी पहचान छोटे शहरों और मध्यमवर्गीय परिवारों की सहज, जीवंत और आधुनिक मां के रूप में और मजबूत हुई।उसी वर्ष बरेली की बर्फी और शुभ मंगल सावधान के लिए उन्हें 63वें फिल्मफेयर अवॉर्ड्स में सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री की श्रेणी में दो नामांकन मिले।

‘गंगूबाई काठियावाड़ी’ में शीला मासी

2022 में संजय लीला भंसाली की ‘गंगूबाई काठियावाड़ी’ में सीमा पाहवा ने शीला मासी का किरदार निभाया। यह फिल्म गंगूबाई के जीवन पर आधारित थी और इसमें सीमा पाहवा ने अपने अनुभव के अनुरूप एक मजबूत सहायक चरित्र को पर्दे पर प्रस्तुत किया।उनके अनुसार, भंसाली कलाकार को अपने किरदार को विकसित करने की जगह देते हैं।

थिएटर आज भी उनके लिए जरूरी है

फिल्मों में लगातार काम करने के बावजूद सीमा पाहवा ने थिएटर को कभी छोड़ा नहीं। वे साफ कहती हैं—“थिएटर तो करना ही है।” उनके लिए थिएटर लगातार सीखने, प्रयोग करने और दर्शकों से सीधे जुड़ने का माध्यम है।वे नसीरुद्दीन शाह को भी अपने अभिनय सीखने की यात्रा का महत्वपूर्ण हिस्सा मानती हैं। उनके अनुसार, उनसे मिली सीख किसी औपचारिक नाटक स्कूल से मिलने वाली सीख से अलग थी।

‘साग मीट’: अभिनय और खाना पकाने का अनोखा प्रयोग

सीमा पाहवा ने भीष्म साहनी की कहानी ‘साग मीट’ पर आधारित एक सोलो स्टेज शो तैयार किया। इस प्रस्तुति की खासियत यह थी कि वे मंच पर अभिनय के साथ वास्तव में खाना पकाती थीं और अंत में दर्शकों को परोसती थीं।उनके लिए यह अभिनय और मंचीय कार्य के बीच संतुलन की चुनौती थी। स्रोत के अनुसार, उन्होंने इस नाटक के 75 से अधिक शो किए।

‘रामप्रसाद की तेरहवीं’ से निर्देशन में कदम

2021 में सीमा पाहवा ने ‘रामप्रसाद की तेरहवीं’ से निर्देशन की शुरुआत की। संयुक्त परिवार की कहानी पर आधारित इस फिल्म में उन्होंने निर्देशन के साथ अपनी रचनात्मक दृष्टि को भी सामने रखा।उन्होंने इस फिल्म की कहानी लिखी और अम्मा की भूमिका भी निभाई। उनके अनुसार, लगातार मां की भूमिकाएं मिलने के बीच उन्होंने एक अलग रास्ता चुनने के लिए खुद निर्देशन करने का फैसला किया।

परिवार और थिएटर: कोपल थिएटर ग्रुप

सीमा पाहवा और मनोज पाहवा के बच्चों ने भी परफॉर्मिंग आर्ट्स की पढ़ाई की। परिवार ने मिलकर कोपल थिएटर ग्रुप की स्थापना की। इस तरह थिएटर का रिश्ता अगली पीढ़ी तक भी पहुंचा।सीमा पाहवा के लिए थिएटर छोड़ना विकल्प नहीं रहा। मंच उनके अभिनय जीवन का लगातार हिस्सा बना हुआ है।

रंगभेद और स्टिरियोटाइप से जुड़ा अनुभव

सीमा पाहवा ने फिल्म इंडस्ट्री में रंगभेद और कलाकारों को एक खास तरह की भूमिका तक सीमित किए जाने के अनुभवों पर भी बात की है। उनके अनुसार, शुरुआती दौर में उन्हें अक्सर छोटी या घरेलू कामकाज से जुड़ी भूमिकाओं तक सीमित किया जाता था।इसी वजह से उन्होंने टेलीविजन और थिएटर को भी अपने लिए महत्वपूर्ण माध्यम बनाया। बाद में बदलते सिनेमा और नए फिल्मकारों के साथ उन्हें अलग तरह के किरदारों के अवसर मिले।

सीमा पाहवा की अभिनय शैली की खासियत

सीमा पाहवा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे घरेलू किरदारों को वास्तविक और जीवंत बना देती हैं। उनकी भूमिकाओं में संवाद से ज्यादा रोजमर्रा की भाषा, हाव-भाव, रिश्तों की समझ और सहज व्यवहार असर पैदा करता है।उनके लंबे थिएटर अनुभव ने उन्हें किरदार की सामाजिक पृष्ठभूमि, भाषा और व्यवहार को समझने की क्षमता दी। यही वजह है कि उनकी मां, पत्नी, बहन या परिवार की दूसरी महिलाओं वाली भूमिकाएं दर्शकों को परिचित और वास्तविक लगती हैं।सीमा पाहवा का सफर दिल्ली के थिएटर से ‘हम लोग’ की बड़की, ‘आंखों देखी’ की अम्मा, ‘दम लगा के हईशा’ की मां और ‘गंगूबाई काठियावाड़ी’ की शीला मासी तक पहुंचता है। अभिनय के साथ थिएटर और निर्देशन से जुड़े रहकर उन्होंने अपनी पहचान को सिर्फ पर्दे पर दिखने वाली अभिनेत्री तक सीमित नहीं रखा। उनके करियर की खास बात यही है कि उन्होंने आम जिंदगी के किरदारों में भी ऐसी सहजता और विश्वसनीयता पैदा की, जिनमें दर्शकों को अपने आसपास के लोगों की झलक दिखाई देती है।

 ENTERTAINMENT DESK | DAILY INSIGHTS

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