Thursday, October 22, 2020
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कर्ज लेते समय किन बातों का ध्यान रखें?

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पंचकुला की एक शांत-सी कॉलोनी में रहने वाले संदीप विज को इस साल वित्तीय मुश्किलों का सामना करना पड़ा, क्योंकि लॉकडाउन के कारण उनकी आय तो कम हो गई, पर ऋण के भुगतान से जुड़ी उनकी प्रतिबद्धता में कोई कमी नहीं आई। 52 साल के संदीप पहली पीढ़ी के उद्यमी हैं। लॉकडाउन के कारण ड्राई क्लिनिंग यूनिट तथा कुरियर एजेंसी के उनके दोनों कारोबार ठप हो गए, जिससे उन्हें अपने परिवार के साथ अधिक वक्त गुजारने को मिला। मगर कर्ज तथा कर्मचारियों के वेतन के बोझ ने उन्हें वित्तीय परेशानी में डाल दिया। वह अब अपने कर्जों को व्यवस्थित करना चाहते हैं, ताकि फिर कभी ऐसी स्थिति से न गुजरना पड़े।

समझदारी से लें कर्ज : आदर्श रूप में हम सब यही चाहते हैं कि हमारे पास जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त धन हो। लेकिन हकीकत में अक्सर हमें अपने वित्तीय लक्ष्यों को पूरा करने के लिए कर्ज लेने पड़ते हैं। पहले कर्ज लेने को सामाजिक बुराई के तौर पर देखा जाता था। पर अब काफी कुछ बदल गया है। आज छुट्टियों में घूमने जाने से लेकर मकान खरीदने तक के के लिए कर्ज उपलब्ध हैं। ईएमआई संस्कृति ने उत्पाद की लागत और सेवा के बीच की रेखा को धुंधला कर दिया है। कई तरह के कर्ज : कर्ज लेने में तब तक कोई बुराई नहीं है, जब तक आपको इसके संभावित परिणामों का एहसास हो। आम तौर पर दो तरह के लोन होते हैं, एक है संपत्ति निर्माण से संबंधित और दूसरा संपत्ति के क्षरण से संबंधित। मकान खरीदने या शिक्षा के लिए जब आप कर्ज लेते हैं, तो यह संपत्ति निर्माण से संबंधित कर्ज हुआ, वहीं जब आप कोई नया फोन लेने या छुट्टियां बिताने के लिए कर्ज लेते हैं, तो यह संपत्ति के क्षरण से संबंधित कर्ज हुआ। 

जब आप अपने रहने के लिए मान लीजिए कि तीस लाख रुपये का मकान खरीदते हैं, तो इस तरह आप अपने लिए संपत्ति का निर्माण भी कर रहे होते हैं, भविष्य में जिसकी कीमत बढ़ने की संभावना होती है। इससे किराये की बचत भी होती है। इसी तरह से जब आप एजुकेशन लोन लेते हैं, तो आप रोजगार की अपनी संभावनाओं को बेहतर कर रहे होते हैं। इन दोनों तरह के कर्जों के एवज में आप कर में छूट का दावा भी कर सकते हैं, जिससे कर्ज की लागत कुछ कम हो जाती है। इसके विपरीत जब आप कर्ज से कोई कार खरीदते हैं, तो शोरूम से कार के बाहर निकलते ही उसका मूल्यह्रास होना शुरू हो जाता है। जबकि आपको कर्ज का भुगतान तो कार की कीमत के आधार पर करना होता है। यही बात मोबाइल फोन, इलेक्ट्रॉनिक सामानों की कर्ज पर खरीदी या फिर छुट्टियां बिताने या किसी और जरूरत के लिए पर्सनल लोन लेने पर भी लागू होती है। इसका यह मतलब नहीं है कि संपत्ति के क्षरण से संबंधित सारे कर्ज खराब ही होते हैं। यदि कर्ज पर खरीदी गई कार से रोजगार में मदद मिलती है और आपकी आय में बढ़ोतरी होती है, तो फिर यह गलत नहीं है। 

कर्जदारों के लिए सबक : संदीप विज को अपने सारे लोन बकाए और ईएमआई तथा ब्याज भुगतान सहित सूची बनाकर यह जानना चाहिए कि ऊंची ब्याज दरों वाले लोन कौन से हैं। आपको ईएमआई के भुगतान में मुश्किल आ रही हो, तो कारोबार से संबंधित लोन के बारे में कर्जदाता बैंक से बात करनी चाहिए। बैंक और कर्ज देने वाली एजेंसियां लोन को रिस्ट्रक्चर करने को तैयार होती हैं।

कर्ज के संबंध में कुछ टिप्स –

(1) कर्ज तभी लें जब कोई और विकल्प न हो।

(2)आपके सारे लोन की कुल ईएमआई आपकी मासिक आय के चालीस फीसदी से अधिक न हो।

(3) समय पर ईएमआई चुकाएं। 

(4) आपात फंड बनाएं ताकि भविष्य में तीन-चार माह की ईएमआई चुकाई जा सके। 

(5) क्रेडिट कार्ड या पर्सनल लोन जैसे ऊंची लागत वाले कर्ज को चुकाने में कोताही न करें। 

(6) कोशिश करें कि कर्ज सीमित अवधि के लिए हो, आवास ऋण 15 वर्ष से अधिक अवधि के लिए न हो।

 

पंचकुला की एक शांत-सी कॉलोनी में रहने वाले संदीप विज को इस साल वित्तीय मुश्किलों का सामना करना पड़ा, क्योंकि लॉकडाउन के कारण उनकी आय तो कम हो गई, पर ऋण के भुगतान से जुड़ी उनकी प्रतिबद्धता में कोई कमी नहीं आई। 52 साल के संदीप पहली पीढ़ी के उद्यमी हैं। लॉकडाउन के कारण ड्राई क्लिनिंग यूनिट तथा कुरियर एजेंसी के उनके दोनों कारोबार ठप हो गए, जिससे उन्हें अपने परिवार के साथ अधिक वक्त गुजारने को मिला। मगर कर्ज तथा कर्मचारियों के वेतन के बोझ ने उन्हें वित्तीय परेशानी में डाल दिया। वह अब अपने कर्जों को व्यवस्थित करना चाहते हैं, ताकि फिर कभी ऐसी स्थिति से न गुजरना पड़े।

समझदारी से लें कर्ज : आदर्श रूप में हम सब यही चाहते हैं कि हमारे पास जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त धन हो। लेकिन हकीकत में अक्सर हमें अपने वित्तीय लक्ष्यों को पूरा करने के लिए कर्ज लेने पड़ते हैं। पहले कर्ज लेने को सामाजिक बुराई के तौर पर देखा जाता था। पर अब काफी कुछ बदल गया है। आज छुट्टियों में घूमने जाने से लेकर मकान खरीदने तक के के लिए कर्ज उपलब्ध हैं। ईएमआई संस्कृति ने उत्पाद की लागत और सेवा के बीच की रेखा को धुंधला कर दिया है। कई तरह के कर्ज : कर्ज लेने में तब तक कोई बुराई नहीं है, जब तक आपको इसके संभावित परिणामों का एहसास हो। आम तौर पर दो तरह के लोन होते हैं, एक है संपत्ति निर्माण से संबंधित और दूसरा संपत्ति के क्षरण से संबंधित। मकान खरीदने या शिक्षा के लिए जब आप कर्ज लेते हैं, तो यह संपत्ति निर्माण से संबंधित कर्ज हुआ, वहीं जब आप कोई नया फोन लेने या छुट्टियां बिताने के लिए कर्ज लेते हैं, तो यह संपत्ति के क्षरण से संबंधित कर्ज हुआ। 

जब आप अपने रहने के लिए मान लीजिए कि तीस लाख रुपये का मकान खरीदते हैं, तो इस तरह आप अपने लिए संपत्ति का निर्माण भी कर रहे होते हैं, भविष्य में जिसकी कीमत बढ़ने की संभावना होती है। इससे किराये की बचत भी होती है। इसी तरह से जब आप एजुकेशन लोन लेते हैं, तो आप रोजगार की अपनी संभावनाओं को बेहतर कर रहे होते हैं। इन दोनों तरह के कर्जों के एवज में आप कर में छूट का दावा भी कर सकते हैं, जिससे कर्ज की लागत कुछ कम हो जाती है। इसके विपरीत जब आप कर्ज से कोई कार खरीदते हैं, तो शोरूम से कार के बाहर निकलते ही उसका मूल्यह्रास होना शुरू हो जाता है। जबकि आपको कर्ज का भुगतान तो कार की कीमत के आधार पर करना होता है। यही बात मोबाइल फोन, इलेक्ट्रॉनिक सामानों की कर्ज पर खरीदी या फिर छुट्टियां बिताने या किसी और जरूरत के लिए पर्सनल लोन लेने पर भी लागू होती है। इसका यह मतलब नहीं है कि संपत्ति के क्षरण से संबंधित सारे कर्ज खराब ही होते हैं। यदि कर्ज पर खरीदी गई कार से रोजगार में मदद मिलती है और आपकी आय में बढ़ोतरी होती है, तो फिर यह गलत नहीं है। 

कर्जदारों के लिए सबक : संदीप विज को अपने सारे लोन बकाए और ईएमआई तथा ब्याज भुगतान सहित सूची बनाकर यह जानना चाहिए कि ऊंची ब्याज दरों वाले लोन कौन से हैं। आपको ईएमआई के भुगतान में मुश्किल आ रही हो, तो कारोबार से संबंधित लोन के बारे में कर्जदाता बैंक से बात करनी चाहिए। बैंक और कर्ज देने वाली एजेंसियां लोन को रिस्ट्रक्चर करने को तैयार होती हैं।

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(1) कर्ज तभी लें जब कोई और विकल्प न हो।

(2)आपके सारे लोन की कुल ईएमआई आपकी मासिक आय के चालीस फीसदी से अधिक न हो।

(3) समय पर ईएमआई चुकाएं। 

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(5) क्रेडिट कार्ड या पर्सनल लोन जैसे ऊंची लागत वाले कर्ज को चुकाने में कोताही न करें। 

(6) कोशिश करें कि कर्ज सीमित अवधि के लिए हो, आवास ऋण 15 वर्ष से अधिक अवधि के लिए न हो।

 

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पोल्ट्री फार्म संचालक को पिस्तौल दिखाकर 59000 रुपये लूटे

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पोल्ट्री फार्म संचालक को पिस्तौल दिखाकर 59000 रुपये लूटे
अमर उजाला ब्यूरो
सोनीपत: शहर के एटलस रोड पर पोल्ट्री फार्म संचालक को लुटेरों ने पिस्तौल दिखाकर 59000 रुपये लूट लिए। पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर लिया है।
आदर्श नगर निगवासी कमालुद्दीन पोल्ट्री फार्म चलाते हैं। वह ईदगाह कालोनी और डबल स्टोरी क्षेत्र में मुर्गों की सप्लाई करते हैं। वह साेमवार को मुर्गों के रुपये इकट्ठे करने दुकानों पर गए थे। रात को जब वह रुपये इकट्ठा करके वापस लौट रहे थे तो रोटरी क्लब के पास दो बाइक पर सवार चार बदमाशों ने उनको रोक लिया। सामने बाइक अड़ाकर लुटेरों ने जान से मारने की धमकी दी। दोनों लुटेरों ने रुपयों वाला थैला छीन लिया और भाग गए। भागते समय वह पोल्ट्री फार्म संचालक की बाइक की चाबी भी निकालकर ले गए। पुलिस बदमाशों को तलाश कर रही है।

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अमर उजाला ब्यूरो
सोनीपत: शहर के एटलस रोड पर पोल्ट्री फार्म संचालक को लुटेरों ने पिस्तौल दिखाकर 59000 रुपये लूट लिए। पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर लिया है।
आदर्श नगर निगवासी कमालुद्दीन पोल्ट्री फार्म चलाते हैं। वह ईदगाह कालोनी और डबल स्टोरी क्षेत्र में मुर्गों की सप्लाई करते हैं। वह साेमवार को मुर्गों के रुपये इकट्ठे करने दुकानों पर गए थे। रात को जब वह रुपये इकट्ठा करके वापस लौट रहे थे तो रोटरी क्लब के पास दो बाइक पर सवार चार बदमाशों ने उनको रोक लिया। सामने बाइक अड़ाकर लुटेरों ने जान से मारने की धमकी दी। दोनों लुटेरों ने रुपयों वाला थैला छीन लिया और भाग गए। भागते समय वह पोल्ट्री फार्म संचालक की बाइक की चाबी भी निकालकर ले गए। पुलिस बदमाशों को तलाश कर रही है।

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जमीनी विवाद में दबंगों ने की महिला की पिटाई, वीडियो वायरल|viral Videos in Hindi – हिंदी वीडियो, लेटेस्ट-ब्रेकिंग न्यूज़ हिंदी वीडियो में

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जमीनी विवाद में दबंगों ने की महिला की पिटाई, वीडियो वायरल|viral Videos in Hindi - हिंदी वीडियो, लेटेस्ट-ब्रेकिंग न्यूज़ हिंदी वीडियो में
चिंता के विचार आपकी ख़ुशी को बर्बाद कर सकते हैं। ऐसा न होने दें, क्योंकि इनमें अच्छी चीज़ों को ख़त्म करने की और समझदारी में निराशा का ज़हरीला बीज बोने की क्षमता होती है। ख़ुद को हमेशा अच्छा परिणाम पाने के लिए प्रोत्साहित करें और ख़राब हालात में भी कुछ-न-कुछ अच्छा देखने का गुण विकसित करें। ख़ास लोग ऐसी किसी भी योजना में रुपये लगाने के लिए तैयार होंगे, जिसमें संभावना नज़र आए और विशेष हो। भूमि से जुड़ा विवाद लड़ाई में बदल सकता है। मामले को सुलझाने के लिए अपने माता-पिता की मदद लें। उनकी सलाह से काम करें, तो आप निश्चित तौर पर मुश्किल का हल ढूंढने में क़ामयाब रहेंगे। किसी से अचानक हुई रुमानी मुलाक़ात आपका दिन बना देगी। काम के लिए समर्पित पेशेवर लोग रुपये-पैसे और करिअर के मोर्चे पर फ़ायदे में रहेंगे। सफ़र के लिए दिन ज़्यादा अच्छा नहीं है। जीवनसाथी के ख़राब व्यवहार का नकारात्मक असर आपके ऊपर पड़ सकता है। स्वयंसेवी कार्य या किसी की मदद करना आपकी मानसिक शांति के लिए अच्छे टॉनिक का काम कर सकता है। परेशान? आप पंडित जी से प्रश्न पूछ सकते हैं या अपनी कुंडली बनवा सकते हैं ।

माशूका…मोबाइल और मौत: प्रेमी पर कसा सबूतों का शिकंजा, गेस्ट हाउस में की थी खौफनाक हत्या

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न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा, Updated Thu, 22 Oct 2020 01:34 AM IST

आगरा में सिकंदरा तिराहा स्थित होटल सिकंदरा गेस्ट हाउस एंड रेस्टोरेंट में महिला प्रीति की हत्या के मामले में पुलिस ने आरोपी लाखन के खिलाफ कोर्ट में चार्जशीट लगा दी है। इसमें 11 गवाह बनाए गए हैं। प्रेमी ने महिला को मोबाइल दिलाने के बहाने बेल्ट से गला घोंटकर मार डाला था। इसके बाद फरार हो गया था। पुलिस ने केस में 11 गवाह बनाए हैं। इनमें साक्ष्य के रूप में सीसीटीवी फुटेज, काल डिटेल और मोबाइल की लोकेशन भी शामिल है।
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Inside Melania Trump’s unprecedented campaign trail absence

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A source who knows the first lady told CNN Melania Trump is doing what she often does: whatever she feels like.

“It is who she is,” says the friend and former administration official of Trump’s staying off the trail while other surrogates and family members tackle packed schedules in battleground states.

“She does what she wants, when she wants … She can be a contrarian,” another former White House staffer said.

The campaign has sought her presence. But with the election less than two weeks away and no scheduled events, it’s unlikely the first lady will engage in any significant way. This stands in stark contrasts to nearly all modern first ladies, many of who served a critical role in humanizing their husbands to women voters.

On Tuesday, citing an “abundance of caution” and a “lingering cough” after her bout with Covid-19, Trump backed out of a planned appearance with her husband to introduce him at a Pennsylvania rally.

It would have been the first lady’s first large-scale, public campaign event since June 2019. The rally would have also marked the first time the public had seen the first lady since September 29 in Ohio, where she attended the first presidential debate.

Melania Trump has never been comfortable in the public eye and campaign travel is not something she enjoys, a source who has worked with the first lady said. Trump prefers to stay home and be present for her son, Barron.

A source familiar with the first lady’s recuperation from Covid-19, which she was diagnosed with earlier this month, says Trump’s voluntary downtime is due to her illness.

“I’m not sure why she’s being criticized for taking care of herself and her son when they both tested positive for coronavirus,” says a White House official.

Frustration

Melania Trump cancels plans to attend Tuesday rally citing Covid recovery

Trump’s unwillingness to campaign or attend fundraisers has been an at times frustrating concept for members of the Trump campaign to swallow, according to two campaign sources, as having a first lady speak to voters is historically the most compelling and effective mode of surrogacy.

“It is certainly not a question of ‘Does the Trump campaign want Melania Trump to make appearances?’ ” a source familiar with campaign operations said. “She’s wanted and needed. It’s just that she doesn’t do them.”

Earlier this fall, when asked when the first lady would make campaign appearances, campaign spokesman Hogan Gidley said: “The first lady is an incredible asset to the country, the President and the campaign. We’re communicating with the first lady’s team to determine the best ways she can be involved moving forward.”

No events ever materialized.

CNN has reached out to Gidley for comment on any of the first lady’s potential events.

The first lady’s absence has been a point of discussion among some in campaign circles, however, the lack of participation is not particularly of concern for the President himself, according to someone familiar with how he has responded.

“He knows her well enough to know that when she doesn’t want to do something, it’s not like he or anyone else is going to change her mind,” the source said.

The White House referred requests for comment to the Trump 2020 campaign.

In 2016, the pleas for Melania Trump’s participation on the trail were just as consistent. Back then, she said her priority was caring for her then-10-year-old son. Trump was ostensibly given a pass as to why she did not make prolific speeches or headline fundraisers.

The occasional wave or brief greeting to throngs at a Trump rally became satisfactory for a campaign struggling to help voters understand who exactly their candidate was behind the scenes, something a spouse can deliver on during an election cycle.

“The answer to us asking her to make appearances was ‘no’ so many times, we eventually just stopped asking,” says someone who worked in a senior position on the 2016 Trump campaign. 2020 doesn’t appear to be all that different. “Anyone would take her, anytime. She’s a rock star,” says a source familiar with campaign strategy.

Hitting the trail?

Melania Trump details Covid illness and reveals son Barron contracted itMelania Trump details Covid illness and reveals son Barron contracted it

On Tuesday, after Trump’s abrupt cancellation, a source familiar with the first lady’s schedule told CNN there was no “rain date” given. On Wednesday, Trump’s chief of staff Stephanie Grisham told CNN that Trump does, in fact, have campaign dates on her calendar.

“She has plans to travel with the President and campaign solo next week,” Grisham said.

Making appearances next week, as Grisham says, will mean the first lady is doing so with one week or less until Election Day.

It could be a tight window for effectiveness.

“A lot of Americans have already voted but, as we’ve seen, much of this is a turnout game,” says Kate Andersen Brower, author of “First Women: The Grace and Power of America’s Modern First Ladies.” “So no, I don’t think it would be too late for her to have some impact if she went out now. She might be able to energize those Trump voters who are not as enamored with him now as they once were.”

Brower does note the historically unprecedented nature of Trump’s invisibility on the campaign trail.

“The only modern example that comes to mind is Jackie Kennedy who was pregnant during the campaign. Because she had had difficult pregnancies in the past she did not campaign much in 1960. Though she did magazine photo shoots and interviews when she could,” Brower said.

Trump has not done a solo magazine interview with an American publication during her tenure in the White House. Her last significant television interview occurred more than two years ago.

“Interviews are the same as campaigning,” said the friend and former administration official. “She’s picky about what she does and when or why she does it. It’s not for lack of public interest or requests, it’s that she doesn’t want to engage.”

When she does ultimately participate in a campaign event, the timing would follow the pattern she opted for in 2016, where she gave her longest speech to date, in Berwyn, Pennsylvania, just five days before the election and after a four-month hiatus from campaign appearances.

Her remarks included a message about communication: “We have to find a better way to talk to each other,” she said.

Revisiting Borat: Still a laugh-out-loud, hilariously offensive movie

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borat, Sacha Baron Cohen, sacha baron cohen borat
Written by Kshitij Rawat
| New Delhi |

October 22, 2020 12:21:50 am

borat, Sacha Baron Cohen, sacha baron cohen boratSacha Baron Cohen’s Borat made moviegoers laugh at topics they would not usually laugh at. (Photo: 20th Century Fox)

“Jagshemash. My name-a Borat. I like you. I like sex. It’s nice,” announced British comedian Sacha Baron Cohen’s now-iconic character, Borat.

Borat or Borat: Cultural Learnings of America for Make Benefit Glorious Nation of Kazakhstan evoked extreme reactions from every corner of the political spectrum, with some dismissing it as offensive trash. Most critics adored it though, and called it different versions of “an important film that is also hysterically funny.”

Borat was a mockumentary starring Sacha Baron Cohen. It featured his fictional titular character Borat Sagdiyev, a Kazakh journalist who is sent to the United States to make a documentary about the country by the Kazakh Ministry of Information so that Kazakhstan can learn from the greatest country in the world.

https://www.youtube.com/watch?v=NVRCyELQnSw

Disguised as Borat, Cohen interacted with real-life Americans to, in his own words, ‘expose their inner prejudices.’ The unwitting participants, unaware that they were being ‘scammed,’ believed Borat was a naïve foreigner with no knowledge of American norms. The film, directed by Larry Charles and co-written by Cohen, made moviegoers laugh at topics they would not usually laugh at. In one scene, Borat is seen discussing equality with a bunch of feminists, who really did want to make this guy understand why people should be treated equally regardless of their gender. Some lines were just absurd and insane beyond measure (and too offensive to be quoted here), and a few sequences can shock anyone. Yes, even today. The movie’s USP is that Borat says and does things in the film that make the viewers guilty for laughing.

The mockumentary had real-life consequences, as usually happens with Sacha Baron Cohen. Borat offended many as the actor-comedian probably wanted and maybe even hoped. And the offended parties included not just those who were unknowingly part of the film. The Kazakhstan government criticised the movie for its depiction of their country. Cohen, in-character as Borat, dismissed the Kazakh government’s concerns as a conspiracy by “evil nitwits” of Uzbekistan. If you have not seen the movie, Borat calls Uzbekistan as the second biggest problem his country is facing followed by Jews. Ouch.

The Cohen-starrer also had to fend off defamation lawsuits from countless “actors” in the movie.

But it was bemusing to see Americans getting fooled by Borat. For Cohen’s character was clearly a caricature of what many Americans probably presume people from third-world countries look and sound like — exaggerated English accent, politically incorrect views and unsophisticated.

This was the greatest achievement of the 2006 mockumentary Borat. It laid bare that twisted, ignorant worldview and bigotry of many Americans. And only a character like Borat, who shared many of those biases, could unmask that. To this day, Borat remains one of the most original comedy films ever made, which both entertains and also makes us think hard about ourselves.

Borat 2 begins streaming on Amazon Prime Video on October 23.

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Review: ‘Borat’ sequel somehow still manages to serve up audacious surprises

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Success hasn’t spoiled “Borat,” but it has complicated the process of becoming him. Even allowing for the fact that he can’t always be the character — he’s a little too recognizable, as the movie illustrates — the comic-provocateur continues to find unwitting marks. Savvier viewers might wind up wondering about the waivers that allowed these people to be featured on camera or the teams of lawyers involved, but with Cohen, making an omelet requires breaking some eggs.

Setting the logistics aside, Cohen (part of a credited team of eight writers) and director Jason Woliner have managed to concoct a clever premise explaining Borat’s belated return to America, on a mission to deliver a gift to Vice President Mike Pence in order to curry favor with the Trump administration and avoid a death sentence in his native Kazakhstan. (Hence the latest unwieldy subtitle, “Delivery of Prodigious Bribe to American Regime for Make Benefit Once Glorious Nation of Kazakhstan.”)

As fans of the original will remember, the fictionalized version of Kazakhstan isn’t a particularly enlightened spot, with such backward attitudes toward women that Borat refers to his daughter as his “non-male son.” Still, through a series of odd circumstances the teenage Tutar (newcomer Maria Bakalova) comes along for the ride, offering an old-fashioned father-daughter bonding experience as the spine for all the over-the-top shenanigans and exploits.

The less given away the better, but once again — in a fashion the star has honed through the years, including his Showtime series “Who is America?” — Cohen fearlessly gets people to participate in absolutely bonkers situations. That can range from having a baker put an anti-Semitic inscription on a cake to consultation with a plastic surgeon to asking a dress-store owner where to find the “No means yes” section.
That also means punking a number of Trump supporters, of both the famous and ordinary varieties. Reports previously surfaced about Cohen’s encounter with Rudy Giuliani, which as presented in the movie is strange, uncomfortable and difficult to clearly decipher, even by the standards of the comic’s history of newsmaking run-ins with political figures.

It almost goes without saying, but this “Subsequent Moviefilm” revels in being as crude and offensive as Borat’s first adventure. So a sequence shot at a debutante ball is equal parts horrifying and sidesplitting, and those more inclined to cringe than laugh might want to spare themselves the experience.

Of course, this “Borat” will actually stream into homes via Amazon, a sign of the pandemic that, yes, overlapped with production and is incorporated into the film. Given that the original was a major hit on a very modest budget, that feels like a genuine coup for the streaming service, although Cohen’s shtick clearly isn’t for faint-hearted partners.

His catchphrase notwithstanding, “Borat” isn’t always very nice; indeed, the material is pointed, and occasionally guilty of working a little too hard to shock. In its best moments, though, the twisted mirror that Cohen holds up to America from a Borat’s-eye-view is telling, and like the previous “moviefilm,” very, very funny.

“Borat Subsequent Moviefilm” premieres Oct. 23 on Amazon.

Women Are at the Forefront of Nigeria’s Police Brutality Protests

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Before Tuesday, the mood among #endSARS protesters in Lagos was optimistic. For more than two weeks, protesters across Nigeria have taken to the streets calling for an end to police brutality and the dissolution of the Special Anti-Robbery Squad (or SARS) police unit. But after violence on Tuesday night, which rights groups say left 12 people dead, many are afraid. “A lot of us at the forefront are terrified for our lives. We’ve never lived through anything like this in Lagos. We watched people get killed yesterday on social media,” says Jola Ayeye, a 28-year-old screenwriter based in Lagos.

An on-the-ground investigation by Amnesty International confirmed Wednesday that the Nigerian army and police killed at least 12 peaceful protesters in two Lagos suburbs the previous evening, as thousands of people protested against police brutality as part of the #EndSARS movement. Witnesses said several unarmed, peaceful protesters were shot dead at Lekki toll gate in Lagos, Nigeria on Oct. 20, as video footage emerged on social media appearing to show the Nigerian military firing live rounds at a crowd protesting as part of the #endSARS movement. Eyewitnesses at a separate protest site in Alausa told Amnesty International that they were attacked by a team of soldiers and policemen, leaving at least two people dead and one critically injured. At least 56 people have died across the country since the nationwide protests began on Oct. 8, with about 38 killed on Tuesday alone, according to Amnesty International.

Read More: The Nigerian Army Shot Dead at Least 12 Peaceful Protesters in Lagos, Rights Group Says. Here’s What to Know

The SARS unit has been the target of protests since 2017, but protesters say this latest wave is different than what came before. The movement is leaderless but driven by a younger generation of Nigerians, tired of being profiled by SARS operatives, who often carry out violent ambushes in plain clothes with little impunity. An Amnesty International report earlier this year documented at least 82 cases of torture, ill treatment and extra-judicial execution by SARS between January 2017 and May 2020, mostly targeting young men between the ages of 18 and 35. Although the Nigerian government announced that the SARS unit would be disbanded on Oct. 11, protesters are skeptical that will lead to real change—authorities have made and broken several promises regarding the disbandment and reforms of SARS over the past four years.

Protesters gather at Lagos’ Lekki toll gate during a demonstration against police brutality on Oct. 15, 2020.

Pierre Favennec—AFP/Getty Images

Nigerian DJ Obianuju Catherine Udeh, better known as DJ Switch, livestreamed on Instagram from Lekki on Tuesday evening and filmed the army shooting rounds of live fire at crowds. “Every Nigerian, especially the diaspora who had no other way to witness this, owe this woman everything,” says London-based Onis Chukwueke-Uba, 25, who was one of more than 150,000 Instagram users watching DJ Switch’s live video as events unfolded in Lagos.

DJ Switch is one of many women on the frontlines of these protests, which began in early October and are among the most widespread wave of perhaps protests in Nigeria campaigning against police brutality. Ayeye, and her podcast co-host Feyikemi Abudu, both based in Lagos, have also become a core part of Nigeria’s protest movement against police brutality, helping spread information on Twitter, raising and distributing funds for protesters and organizing security, medical assistance and legal aid. “This is the first time, at least in my lifetime here, that people are saying ‘enough is enough’,” says 27-year-old Abudu, who currently runs a start-up. She began fundraising a few days after the nationwide protests started on Oct. 8, wanting to provide breakfast for protesters in Lagos.

Read More: “I Really Thought My Life Was Going to End.’ Inside the Protests Taking on Police Brutality in Nigeria

“Young women are having a critical role in sustaining this movement, and young people across Nigeria feel like leaders in their own right,” says Oluwaseun Ayodeji Osowobi, a womens’ rights activist who was on last year’s TIME 100 Next list. Osowobi’s organization, Stand to End Rape, has been providing mental health support for protesters on the front line. As a service-provider helping young women survivors recover from gender-based violence, she knows first-hand the trauma SARS has inflicted on Nigeria’s young people. “Nobody is really safe. I know mothers who have lost their children, I know women who have been raped by these people, I know those who have died, so I have a responsibility too to make sure I fight for the rights of young Nigerians,” she says.

Abudu and Ayeye recall speaking about their frustrations with SARS on their podcast in 2017, during the first wave of campaigns against the unit. They didn’t imagine that three years later, they would be helping organize a support system for protesters, fielding calls in the middle of the night, and directing participants to safety via social media. “We joke that Feyikemi has built a state in ten days,” says Ayeye, referring to volunteers that have come together to organize food, medical assistance and legal aid to support protesters. “The organization and bravery of women really underpins this whole movement,” she says.

Nigeria has a history of women organizing protests. Aisha Yesufu, 46, was a co-organizer of the Bring Back Our Girls movement that called for the safe return of the Chibok schoolgirls kidnapped by Boko Haram in 2014. She says she is proud of the young women who have mobilized during this protest movement. “The Bring Back Our Girls movement was a protest of empathy. #endSARS is more about survival. These are young men and women who are being killed by those who are supposed to protect them, and who are fighting for their life,” says Yesufu, whose photo with her fist raised at the forefront of protests in Abuja on Oct. 10 has been shared widely as a symbol of the protests.

Both Abudu and Ayeye, as well as Osowobi, are part of Feminist Coalition, a collective of Nigerian women who formed in July 2020 to work around feminist causes and the advancement of women’s rights in Nigeria. The group has been instrumental in fundraising to support the protesters on the ground through Bitcoin donations, and has issued daily reports of the money they’ve raised and distributed to ensure accountability. As of Oct. 19, the group had raised more than 74 million naira, equivalent to almost $200,000. All three women are hoping that their activities during the protests could improve things for women in the country more broadly, as well greater equality for other marginalized groups, including LGBTQ people who have experienced hostility and homophobia during protests. “It is incredible for me because especially in this country, where a lot of people have these backwards views about women in leadership positions, I’m hoping this will allow people to see that you need women at the top, at every level of society,” Abudu says. “Simply, we are able to get things done.”

All are reeling from the shock of the deaths at Lekki and Alausa on Tuesday night. Yesufu says she is numb, and Ayeye and Abudu say they are afraid for the dead and injured protesters in their city. The Feminist Coalition is now helping support injured protesters, as well as encouraging others to stay safe and stay at home.

There is also fear among protesters that the government will try to change the narrative of events. Witnesses told Amnesty International that shortly before the shootings, CCTV cameras at the Lekki toll gate were removed by government officials and the electricity was cut in an attempt to hide evidence. Abudu and others have been encouraging protesters on social media to document what happened to them to ensure the truth about what happened at Lekki is told. “Something has to give,” Ayeye said via WhatsApp on Wednesday. “We cannot keep living like this.”

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एयरटेल और जियो के बीच होगी बाजार पर कब्जा जमाने की होड़, हुवावे हो सकती है कंपटीशन से बाहर

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  • Titel: Mukesh Ambani Reliance | Jio Qualcomm 5G Network Deal Vs Airtel Vs China Huawei; A Look Into Competition

मुंबई3 घंटे पहले

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चीन की कुछ देशों के साथ दुश्मनी है तो कुछ देश हाल में कोरोना की वजह से उसकी कंपनियों पर प्रतिबंध लगा चुके हैं। ऐसे में हुवावे के लिए वैश्विक स्तर पर ज्यादा बाजार मिलना मुश्किल है

  • भारत में चीन की कंपनी हुवावे को लेकर अभी भी यह बात स्पष्ट नहीं है कि उसे 5G में शामिल किया जाएगा या नहीं
  • अमेरिका, ताइवान जैसे कई देश चीन से इस समय तनातनी में हैं। इसलिए कई देश हुवावे की 5G सेवा को अपने देश में इंट्री नहीं देंगे

5G की सेवा भले ही अभी लंबे समय बाद भारत में शुरू होगी, पर इसके लिए टक्कर की तैयारी पहले हो गई है। इस टक्कर में एयरटेल, रिलायंस जियो और चीन की हुवावे आमने-सामने होंगी। दरअसल भारत में हालांकि अभी तक हुवावे को 5G में शामिल किया जाएगा या नहीं, इस बात पर स्पष्टता नहीं है। पर वैश्विक स्तर पर जरूर यह तीनों कंपनियां आमने-सामने होंगी। इसमें चीन की हुवावे को जबरदस्त टक्कर मिल सकती है।

रिलायंस जियो ने अमेरिका में किया ट्रायल

बता दें कि रिलायंस इंडस्ट्रीज की टेलीकॉम कंपनी रिलायंस जियो ने अमेरिका में 5G का परीक्षण किया है। रिलायंस जियो के प्रेसिडेंट मैथ्यू ओमान ने क्वालकॉम इवेंट में कहा कि क्वालकॉम और रिलायंस की सब्सिडियरी कंपनी रेडिसिस के साथ मिलकर हम 5G टेक्नोलॉजी पर काम कर रहे हैं, ताकि भारत में इसे जल्द लॉन्च किया जा सके। 5G की सेवा फिलहाल वैश्विक स्तर पर करीबन 70 देशों में चालू है।

1Gbps से ज्यादा की स्पीड

क्वालकॉम ने ऐलान किया कि उसने 1Gbps से ज्यादा स्पीड हासिल कर ली है। अभी दुनियाभर में अमेरिका, साउथ कोरिया, ऑस्ट्रेलिया, स्विट्जरलैंड और जर्मनी जैसे देशों के 5G ग्राहकों को 1Gbps इंटरनेट स्पीड की सुविधा मिल रही है। दूसरी ओर एयरटेल भारत में केवल 5G, होम ब्रॉडबैंड, इंटरनेट ऑफ थिंग्स (आईओटी) और अन्य वायर लाइन प्रोडक्ट ही नहीं डेवलप कर रही है, बल्कि इसका उद्देश्य लोकल स्तर पर कांट्रैक्ट मैन्यूफैक्चरर्स जैसे अमेरिका के फ्लेक्स और भारत के तेजस नेटवर्क के साथ मिलकर इक्विपमेंट का निर्माण करना है।

एयरटेल भी कर रही है तैयारी

एयरटेल भारत के आधार पर विशेष हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर प्रोडक्ट को डेवलप करना चाहता है। इसके लिए वह टेक्नोलॉजी पार्टनर्स के साथ योजना बना रहा है। एयरटेल इस योजना के जरिए अन्य टेलीकॉम कंपनियों को भी यह सेवाएं दे सकती है। लोकल 5 जी इकोसिस्टम से एअरटेल को सप्लाई चेन को बेहतर तरीके से नियंत्रण करने में मदद मिलेगी। साथ ही नेटवर्क की लागत को भी वह कम कर सकेगी। एअरटेल अभी 5G इकोसिस्टम के लिए पार्टनर्स के साथ कमर्शियल एग्रीमेंट साइन करने की प्रक्रिया में है।

जियो के साथ मुकाबला करने की तैयारी

एयरटेल की यह पूरी योजना रिलायंस जियो की 5G टेक्नोलॉजी के साथ मुकाबला करने की है। जियो ने कहा कि यह भारत में 5G सेवा देने और इसे बढ़ाने वाली पहली कंपनी होगी। जियो पहले भारत में उसके बाद इसे अफ्रीकी बाजार, पश्चिमी एशिया और पूर्वी यूरोप में ले जाएगी। इसी तरह एअरटेल ने भी अपने 5G नेटवर्क का फोकस अफ्रीका, बांग्लादेश और लंका में कर रखा है। इसमें एअरटेल खुद का पार्टनर रखेगी। इसके जरिए वह दूसरी टेलीकॉम कंपनियों को सेवा देगी।

2022 में मिल सकती है 5G की सेवा

दरअसल भारत में सरकार 5G स्पेक्ट्रम को 2021 में निलामी के जरिए उपलब्ध कराने की योजना बना रही है। इसके बाद यह माना जा रहा है कि 2022 से 5G की सेवा शुरू हो सकती है। एयरटेल की यह योजना है कि वह अमेरिका की मेवनीर सहित कई कंपनियों के साथ भागीदारी करेगी। यह जापान की एनईसी और ताइवान की सरकाम के साथ भी पार्टनर के लिए योजना बना रही है। इसके साथ ही एयरटेल ने एरिक्सन और नोकिया के साथ पहले पार्टनरशिप की है।

मानेसर और बंगलुरू में आरएंडडी सेट

एयरटेल ने 5G के लिए मानेसर और बंगलुरू में अपनी आरएंडडी लैब को सेट अप किया है। इसमें सैकड़ों करोड़ रुपए का निवेश किया जा चुका है। अभी इसमें 100 से ज्यादा इंजीनियर काम कर रहे हैं। भारती एयरटेल ने अगस्त में कहा था कि वह कोलकाता और कर्नाटक में नोकिया और एरिक्सन के साथ 5G का ट्रायल करेगी।

5G के ट्रायल को लेकर देरी

वैसे भारत में 5G ट्रायल को लेकर देरी हो सकती है। ऐसा इसलिए क्योंकि गृह मंत्रालय ने अभी तक इसके लिए सिक्योरिटी क्लीयरेंस नहीं दिया है। पहले यह इसी साल में जनवरी से मार्च के दौरान होना था। इसी तरह चीनी कंपनियों को अभी भी 5G के लिए मंजूरी देने के लिए कोई निर्णय नहीं हुआ है। भारत में 5 जी नेटवर्क टेक्नोलॉजी को अपने खुद के आरएंडडी से डेवलप करने के लिए अमेरिका और जापान की कंपनियां कोलैबरेशन कर रही हैं।

मोबाइल फोन ऑपरेटर की यह एक नई रणनीति है। दरअसल इसके पीछे की कहानी यह है कि किसी तीसरी पार्टी पर निर्भर होने की बजाय यह खुद की इंटेलेक्चुअल प्रॉपटी बन जाएगी।

330 कंपनियां 5G में कर रही हैं निवेश

पूरी दुनिया में इस समय 330 कंपनियां 5 जी मोबाइल नेटवर्क में निवेश कर रही हैं। ग्लोबल मोबाइल सप्लायर्स एसोसिएशन (जीएसए) के मुताबिक 150 कंपनियों ने प्राइवेट एलटीई और 5G नेटवर्क और स्पेक्ट्रम का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है।

टक्कर इन दो कंपनियों के बीच होगी

भारत में वैसे तो मुख्य टक्कर रिलायंस और एयरटेल के बीच होगी। क्योंकि हुवावे को लेकर ऐसा माना जा रहा है कि सरकार इसे 5G से दूर रखेगी। लेकिन विश्वस्तर पर यह तीनों कंपनियां आमने-सामने टकराएंगी। हालांकि यहां भी कुछ देशों में हुवावे को मंजूरी मिलने में दिक्कत होगी। इसमें ताइवान, अमेरिका जैसे कई देश हैं जो हुवावे को 5G के लिए अपने बाजार नहीं देंगे। इस तरह से देखें तो एयरटेल और जियो ही इन बाजारों में आमने-सामने होंगे। हुवावे ने पहले ही परीक्षण कर लिया है।

चीन की कुछ देशों के साथ दुश्मनी है तो कुछ देश हाल में कोरोना की वजह से उसकी कंपनियों पर प्रतिबंध लगा चुके हैं। ऐसे में हुवावे के लिए वैश्विक स्तर पर ज्यादा बाजार मिलना मुश्किल है।

Brexit talks to resume after Michel Barnier speech breaks impasse

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The Brexit talks will resume on Thursday, with negotiators tasked with working through weekends in pursuit of a deal in the remaining few weeks, after Michel Barnier met the prime minister’s demands for re-engagement.

The impasse was broken after the EU’s chief negotiator made public his intention to “seek the necessary compromises on both sides”, telling the European parliament that he believed an agreement was “within reach” and that he was willing to work “day and night”.

Downing Street said Barnier’s speech on Wednesday morning had met the threshold for the resumption of the troubled talks, with fewer than four weeks left before a deal will have to be ready in time for parliamentary ratification.

EU council president to UK on Brexit: ‘You can’t have your cake and eat it’ – video

The government’s volte-face comes just six days after it said the trade talks were “over”. Boris Johnson had called on Britons to prepare for a no-deal exit from the transition period which ends on 31 December.

Following a call between Barnier and his British counterpart, David Frost, Downing Street said the intensified phase of daily talks would start on Thursday. Either the chief negotiators or their deputies would also meet every 24 hours to maintain focus.

Negotiations will take place daily including weekends, unless both sides agree otherwise, according to a release on the structure of the talks.

A No 10 spokesman said: “Lord Frost discussed the implications of this statement and the state of play with Mr Barnier earlier today. On the basis of that conversation we are ready to welcome the EU team to London to resume negotiations later this week.”

He added: “It is clear that significant gaps remain between our positions in the most difficult areas, but we are ready, with the EU, to see if it is possible to bridge them in intensive talks.

“As both sides have made clear, it takes two to reach an agreement. It is entirely possible that negotiations will not succeed. If so, the UK will end the transition period on Australia terms and will prosper in doing so.”

The resumption of the negotiations brings to a close a period of what some EU diplomats described as a “period of pure farce and theatre”.

Barnier had been due to start talks on Monday but had been told by Frost that his presence would be unwelcome unless there was a “fundamental change” in the EU’s approach to the talks.

The clash had followed an EU summit where leaders had openly offered to compromise, and Barnier himself had offered to speed up the negotiation.

But Downing Street had apparently taken umbrage at a summit communique which lacked mention of the need for “intensive” talks, a concept included in an earlier draft.

There had also been the suggestion that it was up to the UK to move on its negotiating position. In Brussels, it was widely believed to be a planned piece of political theatre designed to hide the fact that Johnson had broken his own deadline of securing a deal by 15 October.

Barnier sated Johnson’s apparent criteria for restarting the talks through a speech in Brussels in which he acknowledged both that the UK had already shown significant flexibility and that the EU would need to compromise.

He told MEPs: “Despite the difficulties we’ve faced, an agreement is within reach if both sides are willing to work constructively, if they’re willing to compromise and if we’re able to make progress in the next few days on the basis of legal text; and if we’re ready for the next few days to resolve the sticking points, the tricky subjects, because time is of the essence. And time is running out each and every day.”

He noted, in particular, that the British negotiators had made important moves in relation to the issue of domestic subsidy control, one of the remaining contentious issues.

The UK had been “willing to move forward and shift in their way of looking at this, to do things in a different way to what exists in current trade deals and with other countries”, he said.

In the last few days, the EU had already offered intensive daily talks on legal texts relating to issues across the trade and security deal, in response to Downing Street’s demands. But those moves had still been regarded as insufficient. “It was too early to end the sulk,” said one EU diplomat. “He has his victory now and perhaps we can have a successful negotiation”.