अमृतसर30 मिनट पहले

  • कॉपी लिंक

अमृतसर में जौड़ा फाटक के पास रेल ट्रैक पर हुए हादसे की भयावह तस्वीर, जब ट्रेन दशहरा देख रहे लोगों को रौंदते हुए गुजर गई थी।

  • दो साल पहले 19 अक्टूबर 2018 को अमृतसर के धोबीघाट ग्राउंड में मनाए गए दशहरा को देख रहे लोगों को ट्रेन ने रौंद डाला था
  • 59 लोगों की जान चली गई और परिवारजनों की आंखों में यादों के साथ आंसू रह गए, परिजन बोले-मदद के दावे सिर्फ दावे ही हैं

आज दशहरा है। बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक पर्व। कोरोना की वजह से आज पहले की तरह उल्लास वाली बात नहीं रहने वाली। फिर भी जब भी दशहरा के उल्लास की बात आती है तो लोग सिहर उठते हैं। बात हो रही है आज से दो साल पहले 19 अक्टूबर 2018 को अमृतसर के धोबीघाट ग्राउंड में मनाए गए दशहरा पर्व की। वहां भी वही उल्लास था, जो एक उत्सव में होता है, लेकिन इसके बाद जो हुआ, वह सब कोई कैसे भुला सकता है। 59 लोगों की जान चली गई और परिवारजनों की आंखों में यादों के साथ आंसू रह गए।

जितना दिल दहला देने वाला मंजर उस दिन रेल हादसे के बाद था, उससे कहीं ज्यादा शर्मनाक हालात इस हादसे के पीड़ित परिवारों की मदद का दावा करने वालों के लिए हैं। अपनों को खोने के 2 साल बाद लोगों के लिए क्या बदला? आइए कुछ परिवारों की असलीयत से जुड़ी इन कहानियों के जरिये जानें…

घर में कपड़े सीने में व्यस्त गिरिंंदर और छोटे भाई पवन की विधवा पत्नियां। इन्हीं दोनों के कांधों पर 6 बच्चों की जिम्मेदारी और है।

घर में कपड़े सीने में व्यस्त गिरिंंदर और छोटे भाई पवन की विधवा पत्नियां। इन्हीं दोनों के कांधों पर 6 बच्चों की जिम्मेदारी और है।

मुआवजे की बचत और दो विधवा बहनों की सिलाई के सहारे 8 लोगों का परिवार

इस हादसे के पीड़ित परिवारों के न्याय के लिए लड़ रहे दीपक कुमार के परिवार से भी एक साथ दो चिताएं जली थी। एक दीपक के पिता गिरिंदर की थी तो दूसरी पिता समान चाचा पवन कुमार की। फल बेचकर परिवार का पेट पाल रहे दोनों भाई दशहरा मेला देखने गए थे। दोनों की कुछ ही मिनटों में मौत हो गई थी। दीपक बताते हैं- पिता और चाचा के चल बसने के बाद मेरी मां और मौसी कपड़े सीकर पाई-पाई जोड़कर अपना और हम 6 भाई-बहन (मेरे अलावा मां, छोटे भाई और एक बहन के अलावा चाचा के परिवार के 4 सदस्यों) का पेट पाल रहीं हैं। सबसे बड़ा मैं ही हूं। पिछले साल ही मैंने ग्रेजुएशन कम्पलीट की है।

फल बेचने वाले गिरिंदर की परिवार के साथ फाइल फोटो, जिसमें पीछे काली टी-शर्ट में नजर आ रहा बड़ा बेटा दीपक ग्रेजुएट हो चुका है, पर नौकरी नहीं मिली।

फल बेचने वाले गिरिंदर की परिवार के साथ फाइल फोटो, जिसमें पीछे काली टी-शर्ट में नजर आ रहा बड़ा बेटा दीपक ग्रेजुएट हो चुका है, पर नौकरी नहीं मिली।

दीपक बताते हैं कि हादसे के वक्त दावे तो बहुत बड़े-बड़े किए गए थे, लेकिन उनमें से पूरा एक ही हुआ है। राज्य सरकार की तरफ से 5 लाख रुपए की आर्थिक सहायता मिली थी। इसके बाद अभी तक सिवाय उम्मीदों के हमारे पास कुछ नहीं है।

गिरिंदर के छोटे भाई पवन कुमार की पत्नी और तीन बच्चे।

गिरिंदर के छोटे भाई पवन कुमार की पत्नी और तीन बच्चे।

दीपक ने बताया- सरकार की तरफ से हर मृतक के परिवार में एक सदस्य को नौकरी देने के दावे की हकीकत यह है कि दो साल बीत जाने के बाद अभी 10 दिन पहले ही डीसी ऑफिस से 34 लोगों की लिस्ट मुख्यमंत्री कार्यालय को भेजी गई है। इसी में एक नाम मेरा भी है। रही बात परिवार का गुजर चलने की तो कुछ शुरुआत में मिली मुआवजाराशि में से बचत और कुछ मां और मौसी की सिलाई के सहारे ही परिवार है।

कमाऊ पूत सन्नी की मौत के बाद पिता दर्शन सिंह, मां दर्शन कौर और एक बिन ब्याही बहन ये तीन सदस्य हैं घर में।

कमाऊ पूत सन्नी की मौत के बाद पिता दर्शन सिंह, मां दर्शन कौर और एक बिन ब्याही बहन ये तीन सदस्य हैं घर में।

कमाने वाला कुंवारा बेटा चला गया, अब मां दर्शन कौर झाड़ू-पोंछा करके अपना, पति का और बेटी का पाल रहीं पेट

दूसरी कहानी मोहकमपुरा सरपंच वाली गली में रह रहे दर्शन सिंह के परिवार की है। हादसे के वक्त 21 साल का बेटा सन्नी एक अच्छी-खासी प्राइवेट जॉब करता था। उसकी मौत के बाद रिक्शा चालक पिता दर्शन सिंह बिस्तर पकड़ गए। मां दर्शन कौर लोगों के घरों में झाड़ू-पोंछा करती है। हालांकि, अभी कुछ ही दिन पहले एक अस्पताल में यही काम मिल गया।

दर्शन कौर के मुताबिक जैसे-तैसे किराए के मकान में दिन तोड़ रहे हैं। उसके और उसके पति के अलावा एक बेटी है, जो मानसिक रूप से विक्षिप्त है। इलाज के लिए पैसे नहीं हैं। बस सांसें चल रहीं हैं, इतना ही काफी है। दर्शन कौर की मानें तो विधायक नवजोत सिंह सिद्धू की तरफ से मेरे समेत इस हादसे के तमाम जरूरतमंद परिवारों का खर्चा खुद उठाने का ऐलान किया गया था। शुरुआत में कुछ महीने मदद मिली भी। फिर बीच में कुछ दिन के लिए बंद हो गई। फिर एक बार कुछ पैसे मिले, लेकिन अब पिछले एक साल से कोई पूछने वाला नहीं है।

सरकार चाहती तो यहां फ्लैट्स में शिफ्ट कर दिए जाते। ज्यादा कुछ नहीं तो कम से कम किराये की दिक्कत तो पीछा छोड़ देती। दर्शन कौर बताती हैं कि यह हाल सिर्फ उनके परिवार का ही नहीं है। उस भयावह हादसे में अपनों को खो चुके 15-16 परिवार किराये पर ही रह रहे हैं।

बेटे दलबीर की फोटो को हाथ में उठाए भावुक हुई मां।

बेटे दलबीर की फोटो को हाथ में उठाए भावुक हुई मां।

रावण के किरदार में वह आखिरी दिन था दलबीर का, अब बेटे की फोटो देखकर अंदर ही अंदर सुबकती रहती है मां
जोड़ा फाटक के पास कृष्ण नगर में रहता यह परिवार मृतक दलबीर का है। वही दलबीर, जो रामलीला में रावण की भूमिका निभाने के बाद हादसे से चंद मिनट पहले ही घर पर कपड़े बदलकर और अपना सम्मानचिह्न रखकर मेले का आनंद लेने गया था। जिस जगह रामलीला होती थी, वह दलबीर के घर से 150 मीटर और इससे गिने-चुने 70 मीटर पर वह स्थान था, जहां यह हृदयविदारक घटना घटी। दलबीर उत्सव स्थल पर लौट रहा था तो तभी पुतलों का दहन शुरू हो गया और इसी दौरान वह ट्रैक पर करने लगा तो डीएमयू ट्रेन आ गई, जो उसने देख ली थी। वह लोगों को बचाने लगा तो उसका खुद का पैर ट्रेन के नीचे आ गया। इसके बाद उसका सिर ट्रेन से टकराया और फट गया। इससे उसकी मौके पर ही मौत हो गई।

दलबीर का बड़ा भाई अपनी मां, दोनों की पत्नियों और बच्चों के साथ रहा रहा है। पहले घर की पहली मंजिल पर दोनों भाई रहते दोनों भाई घर में ही ग्राउंड फ्लोर पर पतंग बनाने का कम करते थे। अब बलबीर अकेले यह काम करता है। पतंगों की तरफ देखता है तो रोना आता है। काम करने का मन नहीं होता, पर करे भी तो क्या, इसके बिना परिवार के पास कोई दूसरा जरिया नहीं दो जून की रोटी जुटाने का। मां भी बेटे की फोटो को देख-देखकर अंदर ही अंदर फूटती रहती है।

हादसे में मारे गए मनीष के परिवार के लोग।

हादसे में मारे गए मनीष के परिवार के लोग।

सिर्फ सिर ही बचा था मनीष का, मां और बाकी घरवाले कहते हैं-दोषियों को कोई नहीं पूछता अब

जब मनीष की मां अपने बेटे के कटे हुए सिर की फोटो दिखा रही होती है तो कहती है कि मौत के दुख से बड़ा सच है मुआवजा और सरकारी नौकरी। ये सच है, क्योंकि पीड़ित परिवारों ने मुआवजे को ही न्याय के तौर पर स्वीकार कर लिया है और नौकरी ने उनके बचे हुए दुख को भी सरकारी अहसान के तले दबाने का काम किया है। ‘जो होना था हो गया’ कहकर दुर्घटना के लिए जिम्मेदार व्यक्ति या संस्था की बजाय अब नजर नौकरी देने का वादा पूरा करने वाले के दरवाजे की तरफ मुड़ गई है।

Leave a Reply